कल्पना कीजिए, लंका का युद्ध अपने अंतिम चरण में है। रावण के बड़े-बड़े योद्धा मारे जा चुके हैं और विजय श्री राम की सेना के द्वार पर खड़ी है। वानर सेना में उत्साह और आत्मविश्वास का माहौल है। पर तभी, एक रात कुछ ऐसा होता है जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। अगली सुबह जब सब उठते हैं तो देखते हैं कि प्रभु श्री राम और लक्ष्मण अपने शिविर से गायब हैं! हर तरफ हड़कंप मच जाता है। कौन है वो शत्रु जो रावण से भी एक कदम आगे बढ़कर श्री राम को ही हर ले गया? यह उस संकट की घड़ी थी जब पवनपुत्र हनुमान को एक बार फिर अपनी भक्ति, बुद्धि और बल की सबसे कठिन परीक्षा देनी थी। यह कथा है पाताल के राजा अहिरावण की और कैसे हनुमान जी इस संकट को दूर कर 'संकटमोचन' कहलाए।
कौन था अहिरावण और उसका भयानक षड्यंत्र क्या था?
जब रावण ने देखा कि उसकी हार निश्चित है, तो उसने हताशा में अपने अंतिम और सबसे मायावी सहारे को याद किया। यह था उसका भाई अहिरावण, जो पाताल लोक का राजा था। अहिरावण तंत्र-मंत्र और मायावी शक्तियों का स्वामी था। रावण के बुलाने पर वह लंका आया और उसने अपने भाई को वचन दिया कि वह श्री राम और लक्ष्मण का अस्तित्व ही मिटा देगा।
उसने एक बहुत ही धूर्त योजना बनाई। आधी रात के समय, जब पूरी वानर सेना गहरी नींद में थी, अहिरावण ने श्री राम के परम भक्त विभीषण का रूप धारण किया। उसके माया के प्रभाव से किसी भी पहरेदार की नींद नहीं टूटी। वह चुपचाप श्री राम की कुटिया में घुसा और अपनी माया से दोनों भाइयों को मूर्छित कर उनका अपहरण कर लिया। कोई कुछ समझ पाता, इससे पहले ही वह उन्हें लेकर सीधे पाताल लोक पहुँच गया।
पाताल लोक में देवी को बलि देने की तैयारी
अहिरावण की योजना बहुत क्रूर थी। वह अपनी आराध्य देवी महामाया को प्रसन्न करने के लिए श्री राम और लक्ष्मण की बलि देना चाहता था। उसे विश्वास था कि इन 'नर रूपी नारायण' की बलि से उसे असीम शक्तियां प्राप्त होंगी और तीनों लोकों में उसका राज होगा। पाताल लोक पहुँचकर उसने अपने दरबार में उत्सव का आदेश दिया और बलि की तैयारियां शुरू कर दीं। उधर लंका में जब सुबह हुई और शिविर में प्रभु श्री राम और लक्ष्मण नहीं मिले, तो पूरी सेना में शोक और भय की लहर दौड़ गई। सब चिंतित थे कि अब क्या होगा। तभी विभीषण ने इस मायावी अपहरण के पीछे अहिरावण का हाथ होने की आशंका जताई और बताया कि वह उन्हें पाताल लोक ले गया होगा।

पाताल लोक का मार्ग और हनुमान जी का संकल्प
जैसे ही पता चला कि प्रभु संकट में हैं, हनुमान जी बिना एक पल गंवाए पाताल लोक की ओर जाने के लिए तैयार हो गए। विभीषण ने उन्हें पाताल लोक का गुप्त मार्ग बताया। हनुमान जी वायु वेग से उस स्थान पर पहुँचे। उन्होंने देखा कि पाताल लोक का द्वार एक विशालकाय और विचित्र प्राणी द्वारा संरक्षित था, जिसका आधा शरीर वानर का और आधा मछली का था। उस प्राणी ने हनुमान जी को रोकते हुए कहा, 'मैं इस द्वार का रक्षक हूँ, मेरी अनुमति के बिना कोई अंदर नहीं जा सकता।'
जब हनुमान जी का सामना हुआ अपने ही पुत्र मकरध्वज से
हनुमान जी ने अपना परिचय दिया, पर वह रक्षक अपनी कर्तव्यनिष्ठा से नहीं डिगा। दोनों के बीच भयंकर युद्ध हुआ। हनुमान जी उस रक्षक के बल और पराक्रम को देखकर हैरान थे। काफी देर युद्ध करने के बाद हनुमान जी ने उसे अपने वश में कर लिया और उससे उसका परिचय पूछा। उस रक्षक ने जो बताया, उसे सुनकर स्वयं हनुमान जी भी आश्चर्य में पड़ गए।
उसने कहा, 'मैं हनुमान का पुत्र मकरध्वज हूँ।' हनुमान जी ने कहा, 'यह कैसे संभव है? मैं तो बाल ब्रह्मचारी हूँ।' तब मकरध्वज ने कथा सुनाई कि जब हनुमान जी लंका दहन के बाद अपनी पूँछ की आग बुझाने समुद्र में उतरे थे, तब उनके पसीने की एक बूँद एक मछली (मकर) ने निगल ली थी। उसी बूँद से उसका जन्म हुआ। अहिरावण ने उसकी वीरता देखकर उसे पाताल पुरी का द्वारपाल नियुक्त कर दिया था।
अपने पुत्र की कहानी जानकर हनुमान जी ने उसे गले लगा लिया। मकरध्वज ने कहा, 'पिताजी, मैं आपकी सहायता करना चाहता हूँ पर मैं अपने स्वामी अहिरावण के वचन से बंधा हूँ। मैं आपको रोकूँगा नहीं, पर मैं आपको भीतर जाने का गुप्त मार्ग बताता हूँ।' इस प्रकार, अपने पुत्र की मदद से हनुमान जी ने पाताल लोक में प्रवेश किया।
हनुमान जी की बुद्धि और पंचमुखी रूप का रहस्य
पाताल लोक के अंदर का दृश्य बहुत भयावह था। हनुमान जी ने स्वयं को एक छोटी मक्खी के आकार में बदल लिया ताकि कोई उन्हें पहचान न सके। वे उड़ते-उड़ते उस स्थान पर पहुँचे जहाँ श्री राम और लक्ष्मण को बलि के लिए एक खंभे से बाँधकर रखा गया था। उन्होंने देखा कि अहिरावण अपनी देवी के सामने पूजा कर रहा था और बलि का समय निकट आ रहा था।
हनुमान जी ने अपनी बुद्धि का प्रयोग किया। उन्होंने पता लगाया कि अहिरावण का अंत करना आसान नहीं है। उसके प्राण एक स्थान पर नहीं, बल्कि पाँच अलग-अलग दिशाओं में रखे पाँच दीपकों में बसते थे। अहिरावण को तभी मारा जा सकता था, जब उन पाँचों दीपकों को एक साथ, एक ही समय पर बुझाया जाए। यह एक असंभव कार्य था। कोई एक व्यक्ति एक ही समय में पाँच अलग दिशाओं में कैसे जा सकता है?
संकटमोचन का पंचमुखी अवतार
इसी असंभव को संभव करने के लिए हनुमान जी ने अपना वह रूप प्रकट किया जो आज भी संकटों को हरने वाला माना जाता है - 'पंचमुखी हनुमान'। इस रूप में उनके पाँच मुख थे, जो अलग-अलग दिशाओं में देख रहे थे।
- 'पूर्व दिशा में वानर मुख, जो शत्रुओं पर विजय दिलाता है।'
- 'पश्चिम दिशा में गरुड़ मुख, जो जीवन की बाधाओं और संकटों को दूर करता है।'
- 'उत्तर दिशा में वराह मुख, जो लंबी आयु और शक्ति प्रदान करता है।'
- 'दक्षिण दिशा में नृसिंह मुख, जो भय, तनाव और डर को समाप्त करता है।'
- 'और ऊपर की ओर हयग्रीव मुख (घोड़े का मुख), जो ज्ञान और विद्या का प्रतीक है।'
इस अद्भुत रूप को धारण कर हनुमान जी उस कक्ष में प्रकट हुए जहाँ दीपक जल रहे थे। उन्होंने एक ही क्षण में अपने पाँचों मुखों से फूंक मारकर पाँचों दीपकों को एक साथ बुझा दिया। दीपकों के बुझते ही अहिरावण की सारी शक्ति समाप्त हो गई और वह निर्जीव होकर धरती पर गिर पड़ा। इस तरह हनुमान जी ने अहिरावण का अंत कर दिया।
इसके बाद उन्होंने प्रभु श्री राम और लक्ष्मण को बंधन मुक्त कराया। प्रभु अपने प्रिय भक्त को इस रूप में देखकर बहुत प्रसन्न हुए। हनुमान जी दोनों भाइयों को अपने कंधों पर बिठाकर वापस उसी स्थान पर ले आए, जहाँ वानर सेना उनकी प्रतीक्षा कर रही थी।
निष्कर्ष: संकटमोचन हनुमान से आज के जीवन की सीख
अहिरावण की यह कथा सिर्फ एक पौराणिक कहानी नहीं है, यह हमें आज के जीवन के लिए बहुत गहरी सीख देती है। हम सभी के जीवन में कभी न कभी ऐसा 'पाताल लोक' जैसा संकट आता है - जब समस्याएं बहुत गहरी होती हैं, रास्ता नहीं दिखता और हम खुद को बंधा हुआ महसूस करते हैं। यह कोई स्वास्थ्य संकट, करियर की परेशानी या रिश्तों की उलझन हो सकती है।
हनुमान जी का चरित्र हमें सिखाता है कि ऐसे समय में घबराने की जगह क्या करना चाहिए:
- समस्या को समझना: हनुमान जी ने पाताल पहुँचकर सीधे युद्ध नहीं किया। पहले उन्होंने मक्खी का रूप धरकर पूरी स्थिति को समझा और अहिरावण की कमजोरी (पाँच दीपक) का पता लगाया। हमें भी संकट के समय तुरंत प्रतिक्रिया देने की बजाय, समस्या की जड़ को समझना चाहिए।
- सही रणनीति बनाना: यह जानकर कि पाँचों दीपक एक साथ बुझाने हैं, उन्होंने अपनी क्षमता को बदला और पंचमुखी रूप धारण किया। यह सिखाता है कि हर समस्या का एक ही समाधान नहीं होता। हमें अपनी सोच और तरीकों में लचीलापन लाना पड़ता है।
- अटूट विश्वास और भक्ति: हनुमान जी की सारी शक्ति उनकी प्रभु श्री राम में अटूट भक्ति से आती थी। हमारे जीवन में यह भक्ति हमारे सिद्धांतों, हमारे परिवार या हमारे लक्ष्य के प्रति हो सकती है। जब हमारा विश्वास पक्का होता है, तो बड़ी से बड़ी चुनौती का सामना करने की हिम्मत अपने आप आ जाती है।
इसलिए, जब भी जीवन में कोई संकट आए, तो हनुमान जी के इस 'संकटमोचन' रूप को याद करें। यह हमें याद दिलाता है कि केवल बल से नहीं, बल्कि बुद्धि, सही रणनीति और अटूट विश्वास से ही जीवन के सबसे अंधेरे 'पाताल लोक' से बाहर निकला जा सकता है।
