होमपेज > राम > भगवान शिव क्यों जपते हैं राम नाम? जानिए इस रहस्य को

भगवान शिव क्यों जपते हैं राम नाम? जानिए इस रहस्य को

भगवान शिव क्यों जपते हैं राम नाम? जानिए इस रहस्य को

हिमालय की शांत चोटियों पर, बर्फ से घिरे कैलाश पर्वत का दृश्य सोचिए। भगवान शिव अपनी आंखें बंद किए समाधि में लीन हैं। उनके चेहरे पर एक गहरा और शांत आनंद दिखाई दे रहा है। जब देवाधिदेव महादेव खुद ध्यान में बैठते हैं, तो मन में यह स्वाभाविक सवाल उठता है कि जो पूरी सृष्टि के स्वामी हैं, वे किसका ध्यान करते हैं?

एक बार माता पार्वती के मन में भी यही जिज्ञासा जागी। उन्होंने बड़ी विनम्रता से महादेव से पूछा कि हे प्रभु, आप तो स्वयं देवों के देव हैं, सारा संसार आपकी पूजा करता है, फिर आप आंखें मूंदकर किसका नाम जपते रहते हैं? तब भगवान शिव ने मुस्कुराते हुए अपने हृदय का सबसे बड़ा रहस्य खोला। उन्होंने बताया कि वे किसी और का नहीं, बल्कि मर्यादा पुरुषोत्तम 'श्री राम' के नाम का निरंतर जप करते हैं।

कैलाश पर्वत पर भगवान शिव शांत मुद्रा में ध्यानमग्न बैठे हैं और माता पार्वती उनके सामने हाथ जोड़कर विस्मय और आदर के साथ बैठकर उनसे सवाल पूछ रही हैं

माता पार्वती का प्रश्न और महादेव का प्रिय मंत्र

पद्म पुराण और रामचरितमानस में इस सुंदर प्रसंग का वर्णन मिलता है। जब माता पार्वती ने भगवान शिव से पूछा कि विष्णु सहस्रनाम (भगवान विष्णु के एक हजार नाम) का पाठ करने जितना फल किस एक नाम से मिल सकता है, तब भोलेनाथ ने एक बहुत ही सरल और प्रभावशाली मंत्र बताया था।

भगवान शिव ने पार्वती जी से कहा:

'श्री राम राम रामेति रमे रामे मनोरमे।
सहस्रनाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने॥'

इस श्लोक का बहुत सीधा और सुंदर अर्थ है। महादेव कहते हैं—हे सुमुखी (पार्वती)! मैं हमेशा 'राम-राम-राम' इस परम पावन नाम में ही रमण करता हूं, उसी में आनंद पाता हूं। यह सुंदर 'राम' नाम भगवान विष्णु के एक हजार पवित्र नामों के बराबर है। यानी जो फल किसी को विष्णु सहस्रनाम के पूरे पाठ से मिलता है, वही फल केवल एक बार सच्चे मन से 'राम' कहने पर मिल जाता है।

शिवजी के लिए राम नाम केवल कोई साधारण शब्द नहीं है, बल्कि वह उनका आत्म-स्वरूप और विश्राम है। वे सांस लेते हुए और छोड़ते हुए भी इसी नाम की ऊर्जा में लीन रहते हैं।

'रा' और 'म'—इन दो अक्षरों का अनूठा विज्ञान

संत तुलसीदास जी ने रामचरितमानस के बालकांड में 'राम' नाम की महिमा का बहुत गहरा विश्लेषण किया है। उन्होंने समझाया है कि 'राम' शब्द केवल दो अक्षरों से मिलकर बना है, लेकिन यह कोई सामान्य शब्द नहीं है। यह वैदिक परंपरा के दो सबसे बड़े महामंत्रों का निचोड़ (सार) है।

सनातन परंपरा में दो अष्टाक्षर और पंचाक्षर मंत्र बहुत प्रमुख माने गए हैं:

  • पहला मंत्र है भगवान नारायण का: 'ॐ नमो नारायणाय'।
  • दूसरा मंत्र है देवाधिदेव महादेव का: 'ॐ नमः शिवाय'।

विद्वानों और संतों के अनुसार, नारायण मंत्र की असली आत्मा उसका दूसरा अक्षर 'रा' है। यदि नारायणाय में से 'रा' हटा दिया जाए, तो वह 'नायन' जैसा बन जाता है जिसका कोई शुभ अर्थ नहीं बचता। ठीक इसी तरह, शिव पंचाक्षर मंत्र 'नमः शिवाय' का प्राण-अक्षर 'म' है। यदि इसमें से 'म' निकाल दिया जाए, तो वह 'न शिवाय' (जो शिव यानी कल्याणकारी न हो) बन जाता है।

भगवान शिव ने नारायण मंत्र से अमृत रूपी अक्षर 'रा' लिया और अपने प्रिय मंत्र से कल्याणकारी अक्षर 'म' लिया। इन दोनों अक्षरों के मिलने से बना दिव्य मंत्र—'राम'। यही कारण है कि यह नाम दोनों प्रमुख परंपराओं (शैव और वैष्णव) का हृदय बन गया।

समुद्र मंथन का विष और राम नाम की शीतलता

पौराणिक कथाओं में एक बहुत प्रसिद्ध घटना आती है जब देवताओं और असुरों ने मिलकर समुद्र मंथन किया था। उस मंथन से चौदह रत्नों से पहले कालकूट (हलाहल) नाम का भयंकर विष निकला। उस विष की ज्वाला इतनी भयानक थी कि तीनों लोकों के जीव-जंतु जलने लगे।

सृष्टि की रक्षा के लिए भगवान शिव ने उस पूरे विष को अपनी हथेली पर रखकर पी लिया। विष इतना तीखा और गर्म था कि शिवजी का कंठ नीला पड़ गया, जिससे उनका नाम 'नीलकंठ' हुआ। विष की भयंकर गर्मी से उनका शरीर तपने लगा। उस जलन को शांत करने के लिए देवताओं ने उन पर जल चढ़ाया, बेलपत्र अर्पित किए और उनके मस्तक पर चंद्रमा को बैठाया गया।

परंतु शास्त्रों में मान्यता है कि बाहरी शीतलता के साथ-साथ शिवजी ने अपने भीतर की जलन को शांत करने के लिए जिस नाम का सहारा लिया, वह 'राम' नाम ही था। जैसे ही उन्होंने अपने मन में राम नाम का स्मरण किया, उस नाम के शीतल प्रभाव ने हलाहल विष के ताप को पूरी तरह शांत कर दिया। तभी से शिवजी ने इस नाम को अपने गले का सबसे अनमोल हार बना लिया।

काशी का मणिकर्णिका घाट और तारक मंत्र का रहस्य

हमारे देश में धर्मनगरी काशी (वाराणसी) को मोक्ष की नगरी माना जाता है। मान्यता है कि भगवान शिव स्वयं काशी के स्वामी हैं और वहां देह त्याग करने वाले हर जीव को मुक्ति दिलाते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि शिवजी मुक्ति कैसे देते हैं?

शास्त्रों और लोक-मान्यताओं के अनुसार, जब कोई प्राणी काशी के पावन घाटों पर अपने अंतिम क्षण गिन रहा होता है, तब स्वयं भगवान विश्वनाथ उसके कान में एक दिव्य मंत्र फूंकते हैं। इस मंत्र को 'तारक मंत्र' कहा जाता है। तारक का अर्थ होता है—जो संसार रूपी भवसागर से पार उतार दे।

  • यह तारक मंत्र कोई लंबा या कठिन अनुष्ठान नहीं है, बल्कि केवल दो अक्षरों का नाम—'राम' है।
  • भगवान शिव उस आत्मा के कान में धीरे से 'राम' नाम का उच्चारण करते हैं।
  • उस पावन नाम को सुनते ही जीव के सारे जन्म-जन्मांतर के पाप मिट जाते हैं और उसे सीधे मोक्ष मिल जाता है।

यह कथा हमें बताती है कि स्वयं मोक्षदाता भगवान शिव भी मुक्ति देने के लिए राम नाम की शक्ति का ही सहारा लेते हैं। इससे बड़ा इस नाम का सम्मान और क्या हो सकता है?

शिव और राम का परस्पर अनन्य प्रेम

अक्सर लोगों के मन में यह भ्रम रहता है कि शिव बड़े हैं या राम। लेकिन हमारे संतों ने स्पष्ट किया है कि इन दोनों के बीच कोई भेद नहीं है। दोनों एक-दूसरे के परम भक्त और आराध्य हैं।

जब भगवान विष्णु त्रेतायुग में श्री राम के रूप में धरती पर आए, तो उन्होंने लंका पर चढ़ाई करने से पहले समुद्र तट पर शिवलिंग की स्थापना की। आज हम उस पावन धाम को 'रामेश्वरम' के नाम से जानते हैं। जब श्री राम से पूछा गया कि 'रामेश्वर' का अर्थ क्या है, तो उन्होंने बहुत सुंदर व्याख्या की—'रामस्य ईश्वरः इति रामेश्वरः' यानी राम के जो ईश्वर हैं, वे रामेश्वर हैं (भगवान शिव)।

वहीं दूसरी ओर, जब भगवान शिव से यही सवाल पूछा गया, तो उन्होंने कहा—'रामः ईश्वरो यस्य सः रामेश्वरः' यानी राम जिसके ईश्वर हैं, वह रामेश्वर है (स्वयं शिव)। दोनों एक-दूसरे को अपना स्वामी मानते हैं। रामचरितमानस में भगवान राम स्वयं कहते हैं कि जो शिव से द्रोह करके मेरी भक्ति करना चाहता है, वह मुझे सपने में भी पसंद नहीं आ सकता।

आज के जीवन के लिए सीख और व्यावहारिक महत्व

आज की तेज़-तर्रार जिंदगी में हर व्यक्ति किसी न किसी तनाव, चिंता और अशांति से जूझ रहा है। हम मानसिक शांति के लिए बहुत सी चीजें ढूंढते हैं, लेकिन मन का भटकाव कम नहीं होता। भगवान शिव और राम नाम के इस संबंध से हमें अपने रोजमर्रा के जीवन के लिए कुछ बहुत गहरी बातें सीखने को मिलती हैं:

सबसे पहली सीख है—सरलता की शक्ति। भगवान शिव जैसे महान देव ने किसी बहुत कठिन या जटिल रास्ते को नहीं, बल्कि दो अक्षरों के सहज नाम को अपनी शक्ति बनाया। ध्यान लगाने के लिए हमें किसी भारी-भरकम नियम में उलझने की ज़रूरत नहीं है। जब भी मन विचलित हो, आप आंखें बंद करके शांत भाव से 'राम' नाम का मानसिक जप कर सकते हैं। इसके ध्वनि कंपन (sound vibration) से मन तुरंत शांत होने लगता है।

दूसरी बड़ी सीख है—आदर और समन्वय का भाव। शिव और राम का संबंध हमें सिखाता है कि जीवन में कभी 'मैं बड़ा या तू बड़ा' का अहंकार नहीं होना चाहिए। जहां सच्चा प्रेम और सम्मान होता है, वहां हर कोई एक-दूसरे को आगे रखता है। अपने परिवार और समाज में अगर हम इसी आदर भाव को अपनाएं, तो हमारे रिश्तों के बहुत सारे तनाव अपने आप समाप्त हो सकते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

क्या भगवान शिव सच में राम नाम का जप करते हैं?

हाँ, पद्म पुराण और रामचरितमानस जैसे कई प्रामाणिक ग्रंथों के अनुसार भगवान शिव निरंतर 'राम' नाम का जप और ध्यान करते हैं, और वे इसे सभी मंत्रों का सार मानते हैं।

'श्री राम राम रामेति' मंत्र का क्या अर्थ है?

इस मंत्र में भगवान शिव माता पार्वती से कहते हैं कि राम नाम का एक बार जप करना भगवान विष्णु के एक हजार नामों (विष्णु सहस्रनाम) के बराबर फल देता है, इसलिए वे सदैव इसी नाम में रमण करते हैं।

काशी में मृत्यु के समय शिवजी कौन-सा मंत्र सुनाते हैं?

धार्मिक मान्यता के अनुसार, काशी में प्राण त्यागने वाले जीव के कान में भगवान शिव तारक मंत्र के रूप में 'राम' नाम ही सुनाते हैं, जिससे उस आत्मा को भवसागर से मुक्ति मिल जाती है।

क्या राम नाम जपने के लिए किसी कठिन नियम या दीक्षा की ज़रूरत होती है?

नहीं, राम नाम बहुत ही सरल और स्वतंत्र माना गया है; इसे किसी भी उम्र का व्यक्ति, कहीं भी, उठते-बैठते या काम करते हुए पूरी श्रद्धा के साथ जप सकता है।