होमपेज > त्यौहार > भीष्म पितामह ने प्राण त्यागने के लिए मकर संक्रांति क्यों चुनी?

भीष्म पितामह ने प्राण त्यागने के लिए मकर संक्रांति क्यों चुनी?

भीष्म पितामह ने प्राण त्यागने के लिए मकर संक्रांति क्यों चुनी?

कुरुक्षेत्र की शांत रणभूमि और एक प्रतीक्षा

कल्पना कीजिए, महाभारत का महायुद्ध समाप्त हो चुका है। कौरवों और पांडवों की सेनाएं अपने शिविरों को लौट चुकी हैं। चारों ओर शांति है, लेकिन एक ऐसी शांति जो अनगिनत वीरों के बलिदान के बाद आई है। इस शांत हो चुकी रणभूमि पर, बाणों से बिंधा एक शरीर अभी भी लेटा है। ये शरीर है गंगापुत्र देवव्रत का, जिन्हें हम सब भीष्म पितामह के नाम से जानते हैं।

उन्हें अपने पिता शांतनु से इच्छा-मृत्यु का वरदान प्राप्त था। यानी, वे जब चाहें, तभी मृत्यु उन्हें छू सकती थी। फिर ऐसा क्या था कि वे असहनीय पीड़ा सहते हुए, बाणों की शय्या पर दिन गिन रहे थे? वे एक पल में अपने कष्टों का अंत कर सकते थे, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। उन्होंने प्रतीक्षा की। एक खास दिन की, एक खास मुहूर्त की। वह दिन था मकर संक्रांति का। आखिर क्यों? इस प्रश्न का उत्तर केवल एक कहानी नहीं, बल्कि जीवन, मृत्यु और कर्म के गहरे रहस्यों को उजागर करता है।

इच्छा-मृत्यु का वरदान: एक अद्भुत शक्ति

सबसे पहले यह समझना ज़रूरी है कि भीष्म पितामह को यह वरदान मिला कैसे था। उनके पिता, राजा शांतनु, एक निषाद कन्या सत्यवती से विवाह करना चाहते थे। लेकिन सत्यवती के पिता ने शर्त रखी कि उनकी बेटी से उत्पन्न पुत्र ही हस्तिनापुर का राजा बनेगा। यह सुनकर देवव्रत (भीष्म का मूल नाम) ने एक ऐसी प्रतिज्ञा ली, जिसने इतिहास को बदल दिया। उन्होंने न केवल राजगद्दी का त्याग किया, बल्कि आजीवन अविवाहित रहने का भी प्रण लिया, ताकि भविष्य में उनकी संतान राजसिंहासन के लिए कोई चुनौती न बने।

अपने पुत्र के इस महान त्याग और पितृभक्ति से प्रसन्न होकर राजा शांतनु ने उन्हें वरदान दिया, 'पुत्र, तुम्हारी मृत्यु तभी होगी, जब तुम स्वयं चाहोगे। कोई भी तुम्हें तुम्हारी इच्छा के विरुद्ध नहीं मार सकता।'

युवा देवव्रत (भीष्म) अपने पिता शांतनु के सामने प्रतिज्ञा ले रहे हैं, उनकी आँखों में दृढ़ निश्चय और त्याग का भाव है, पृष्ठभूमि में हस्तिनापुर का राजमहल है।

यह वरदान एक बहुत बड़ी शक्ति थी, लेकिन महाभारत के युद्ध में यही वरदान उनके लिए सबसे बड़ी परीक्षा बन गया। वे चाहते हुए भी अपने प्रियजनों को एक-दूसरे के विरुद्ध लड़ते हुए देखने को विवश थे। जब अर्जुन के बाणों ने उनके शरीर को छेद दिया, तब भी उनकी मृत्यु नहीं हुई, क्योंकि उनकी 'इच्छा' अभी बाकी थी। वे गिरकर बाणों की शय्या पर लेट गए और सही समय की प्रतीक्षा करने लगे।

सूर्य का उत्तरायण: जब देवताओं के दिन शुरू होते हैं

भीष्म पितामह के प्रतीक्षा करने का सबसे मुख्य और गहरा कारण था सूर्य की दिशा का बदलना। हिंदू धर्म की मान्यताओं के अनुसार, सूर्य वर्ष में दो बार अपनी स्थिति बदलता है। इन दो अवधियों को उत्तरायण और दक्षिणायन कहा जाता है।

  • 'दक्षिणायन:' यह लगभग छह महीने की अवधि होती है जब सूर्य दक्षिण की ओर गति करता है। इसे देवताओं की रात्रि और पितरों का दिन माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि इस काल में शरीर छोड़ने वाली आत्माओं को या तो चंद्रलोक जाकर पुनः पृथ्वी पर जन्म लेना पड़ता है या फिर वे पितृलोक में वास करती हैं। मोक्ष या देवलोक के द्वार इस समय बंद माने जाते हैं।
  • 'उत्तरायण:' यह भी छह महीने की अवधि है जब सूर्य उत्तर की ओर गति करता है। इसे देवताओं का दिन कहा जाता है। यह समय जप, तप, साधना और शुभ कार्यों के लिए बहुत अच्छा माना जाता है। मान्यता है कि उत्तरायण में शरीर छोड़ने वाली पुण्यात्माओं के लिए स्वर्ग या मोक्ष के द्वार खुल जाते हैं। उनकी आत्मा सूर्य मार्ग से होकर ब्रह्मलोक को प्राप्त होती है।

जिस समय भीष्म पितामह बाणों की शय्या पर लेटे थे, उस समय सूर्य दक्षिणायन में था। वे एक महान ज्ञानी और योगी थे। वे जानते थे कि अगर उन्होंने इस अशुभ काल में प्राण त्यागे, तो उनकी आत्मा की यात्रा उतनी सहज नहीं होगी। वे जीवन भर धर्म और त्याग के मार्ग पर चले थे, और वे अपनी अंतिम यात्रा को भी सर्वोत्तम बनाना चाहते थे। इसलिए, उन्होंने उस दिन तक प्रतीक्षा करने का संकल्प लिया, जब सूर्य मकर राशि में प्रवेश करके उत्तरायण हो जाएगा।

58 दिनों की शर-शय्या: एक प्रतीक्षा या अंतिम तपस्या?

यह प्रतीक्षा कोई साधारण प्रतीक्षा नहीं थी। भीष्म पितामह लगभग 58 दिनों तक बाणों की उस कठिन शय्या पर लेटे रहे। यह उनके जीवन की अंतिम और सबसे कठिन तपस्या थी। वे हर पल असहनीय शारीरिक पीड़ा से गुज़र रहे थे, लेकिन उनका मन शांत और संकल्प दृढ़ था।

ज्ञान का अंतिम प्रवाह

उन्होंने इस पीड़ा भरे समय को व्यर्थ नहीं जाने दिया। जब युद्ध समाप्त हुआ और पांडव उनसे मिलने आए, तो उन्होंने इस अवसर का उपयोग धर्म और नीति की शिक्षा देने के लिए किया। उन्होंने युधिष्ठिर के सभी प्रश्नों के उत्तर दिए और राजधर्म, मोक्षधर्म और जीवन के अन्य गूढ़ रहस्यों पर विस्तार से प्रकाश डाला।

इसी संवाद के दौरान उन्होंने भगवान विष्णु की स्तुति में 'विष्णु सहस्रनाम' का अद्भुत पाठ किया, जो आज भी हिंदू धर्म के सबसे पवित्र स्तोत्रों में से एक माना जाता है। उन्होंने अपनी पीड़ा को एक अवसर में बदल दिया, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ उनके ज्ञान से लाभान्वित हो सकें। यह दिखाता है कि एक सच्चा योगी अपने शरीर के कष्टों से ऊपर उठकर भी लोक कल्याण के बारे में सोचता है।

मकर संक्रांति: वह निर्णायक क्षण

अंत में, वह दिन आया जिसकी भीष्म पितामह प्रतीक्षा कर रहे थे। माघ मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को सूर्य ने मकर राशि में प्रवेश किया और उत्तरायण काल का आरंभ हुआ। यही दिन मकर संक्रांति के रूप में मनाया जाता है।

जैसे ही यह शुभ घड़ी आई, भीष्म पितामह ने अपने मन को एकाग्र किया, अपनी सारी इंद्रियों को समेटा और अपनी प्राण-वायु को ब्रह्मरंध्र (सिर के शीर्ष) की ओर केंद्रित किया। उन्होंने पांडवों और वहां उपस्थित सभी लोगों से विदा ली और अपनी इच्छा से अपने शरीर का त्याग कर दिया। उनकी आत्मा एक दिव्य प्रकाश के रूप में उनके शरीर से निकली और देवलोक की ओर प्रस्थान कर गई। उन्होंने अपनी मृत्यु के क्षण को भी अपने नियंत्रण में रखा और उसे एक उत्सव बना दिया।

निष्कर्ष: भीष्म की प्रतीक्षा से हम आज क्या सीख सकते हैं?

भीष्म पितामह की यह कथा केवल एक पौराणिक घटना नहीं है, बल्कि आज के आधुनिक जीवन के लिए भी इसमें गहरे संदेश छिपे हैं।

  1. धैर्य और सही समय का महत्व: आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में हम हर काम तुरंत करना चाहते हैं। भीष्म की प्रतीक्षा हमें सिखाती है कि जीवन में कुछ बड़े लक्ष्यों के लिए धैर्य रखना और सही समय का इंतजार करना कितना ज़रूरी है। हर काम का एक नियत समय होता है, और हड़बड़ी में लिए गए फैसले अक्सर गलत साबित होते हैं।
  2. संकट को अवसर में बदलना: वे असहनीय पीड़ा में थे, फिर भी उन्होंने शिकायत करने या निराश होने की बजाय उस समय का उपयोग ज्ञान बांटने में किया। यह हमें सिखाता है कि जीवन के सबसे कठिन दौर में भी हम सकारात्मक रह सकते हैं और अपने दुखों को भी दूसरों की भलाई का माध्यम बना सकते हैं।
  3. संकल्प की शक्ति: 58 दिनों तक दर्द सहते हुए प्रतीक्षा करना साधारण बात नहीं है। यह उनके अटूट संकल्प और आत्म-नियंत्रण को दिखाता है। यह हमें प्रेरणा देता है कि यदि हमारा संकल्प दृढ़ हो, तो हम किसी भी मुश्किल पर विजय पा सकते हैं।
  4. जीवन का अंत भी गरिमापूर्ण हो: भीष्म ने न केवल अपना जीवन गरिमा से जिया, बल्कि अपनी मृत्यु को भी एक आदर्श बना दिया। उन्होंने हमें सिखाया कि जीवन के अंत की तैयारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है, जितना कि जीवन जीना। इसका अर्थ है अपने कर्मों को शुद्ध रखना और मन को आध्यात्मिक लक्ष्य पर केंद्रित करना।

इसलिए, अगली बार जब मकर संक्रांति का त्योहार आए, तो इसे केवल एक फसल का त्योहार न समझें। इस दिन उस महान योद्धा और योगी को भी याद करें, जिसने हमें सिखाया कि सही समय, सही संकल्प और धर्म के मार्ग पर चलकर मृत्यु पर भी विजय प्राप्त की जा सकती है।