दिवाली का एक अनसुना पहलू: राजा बलि का पूजन
जब दिवाली का नाम आता है, तो हमारे मन में दीपों की जगमगाहट, माँ लक्ष्मी और श्री गणेश का पूजन, और अयोध्या में भगवान राम के लौटने का उल्लास भर जाता है। यह प्रकाश, समृद्धि और बुराई पर अच्छाई की जीत का त्योहार है। पर क्या आपने कभी सोचा है कि इसी त्योहार के दौरान भारत के कई हिस्सों में एक असुर राजा की पूजा भी की जाती है? यह सुनकर थोड़ा आश्चर्य होता है, है न? जिस संस्कृति में हम देवताओं के शत्रुओं को नकारात्मक रूप में देखते हैं, वहाँ एक असुर राजा को इतना सम्मान क्यों दिया जाता है?
यह कहानी है राजा बलि की। एक ऐसे असुर राजा, जो अपने पराक्रम, न्याय और दान के लिए तीनों लोकों में प्रसिद्ध थे। उनकी कथा हमें सिखाती है कि भक्ति और सदाचार किसी कुल या जन्म के मोहताज नहीं होते। आइए, इस दिवाली हम उस महान राजा की कहानी को जानें, जिनके स्वागत में भी दीपक जलाए जाते हैं और जिनकी दानशीलता की कथा स्वयं भगवान ने अमर कर दी।
कौन थे राजा बलि? असुर कुल में एक महान भक्त
राजा बलि कोई साधारण असुर नहीं थे। वे भगवान विष्णु के परम भक्त प्रह्लाद के पौत्र (पोते) थे। अपने दादा की तरह ही, उनके मन में भी भगवान के प्रति गहरी आस्था थी। वे एक शक्तिशाली और न्यायप्रिय शासक थे। उनके राज में प्रजा बहुत सुखी और समृद्ध थी। उन्होंने अपने तपोबल और बाहुबल से तीनों लोकों, यानी पृथ्वी, स्वर्ग और पाताल, पर अधिकार कर लिया था।
जब उन्होंने इंद्र को पराजित कर स्वर्ग पर भी अपना शासन स्थापित कर लिया, तो सभी देवता चिंतित हो उठे। वे अपनी माता अदिति के पास सहायता के लिए गए। माता अदिति ने अपने पुत्रों की पीड़ा देखकर भगवान विष्णु से प्रार्थना की। उन्होंने भगवान से आग्रह किया कि वे देवताओं को उनका सम्मान और अधिकार वापस दिलाएं। भगवान विष्णु ने उन्हें आश्वासन दिया कि वे स्वयं अदिति के पुत्र के रूप में जन्म लेंगे और इस समस्या का समाधान करेंगे।

यहीं से भगवान के वामन अवतार की भूमिका तैयार होती है। यह समझना ज़रूरी है कि बलि का शासन अत्याचारी नहीं था, बल्कि उन्होंने अपने पराक्रम से देवताओं का स्थान ले लिया था। भगवान का उद्देश्य बलि का विनाश करना नहीं, बल्कि ब्रह्मांड के संतुलन को फिर से स्थापित करना था।
भगवान का वामन अवतार और तीन पग भूमि का दान
राजा बलि अपने गुरु, शुक्राचार्य के मार्गदर्शन में अश्वमेध यज्ञ कर रहे थे। यह उनका सौवाँ यज्ञ था। यदि यह यज्ञ पूरा हो जाता, तो वे हमेशा के लिए इंद्र के पद पर स्थापित हो जाते। उनके दान और पुण्य की कीर्ति चारों दिशाओं में फैल चुकी थी। यज्ञ के दौरान उन्होंने घोषणा की थी कि कोई भी याचक उनके द्वार से खाली हाथ नहीं लौटेगा।
तभी यज्ञशाला में एक छोटे कद के, तेजस्वी ब्राह्मण बालक ने प्रवेश किया। उनके हाथ में एक छाता और एक कमंडल था। उनका दिव्य तेज देखकर सभी उपस्थित लोग, स्वयं राजा बलि भी, उनकी ओर आकर्षित हो गए। वह बालक और कोई नहीं, स्वयं भगवान विष्णु थे, जो वामन के रूप में आए थे।
बलि का वचन
राजा बलि ने उस ब्राह्मण बालक का आदर-सत्कार किया और उनसे पूछा, 'हे ब्रह्मचारी, आज्ञा दीजिए, मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूँ? आप जो भी मांगेंगे, मैं आपको दूँगा।'
वामन ने मुस्कुराते हुए कहा, 'हे राजन, मुझे अधिक कुछ नहीं चाहिए। मुझे बस अपने छोटे-छोटे पैरों से तीन पग (कदम) भूमि चाहिए, जहाँ मैं बैठकर तपस्या कर सकूँ।'
यह सुनकर बलि को हँसी आ गई। उन्होंने कहा, 'बस इतनी सी बात? आप मुझसे गाँव, धन, हाथी-घोड़े, कुछ भी मांग सकते थे। पर कोई बात नहीं, मैं आपको तीन पग भूमि देने का वचन देता हूँ।'
जैसे ही बलि ने संकल्प लेने के लिए अपने हाथ में जल लिया, उनके गुरु शुक्राचार्य समझ गए कि यह कोई साधारण बालक नहीं है। उन्होंने अपनी दिव्य दृष्टि से जान लिया कि यह स्वयं विष्णु हैं, जो देवताओं की सहायता के लिए आए हैं। उन्होंने बलि को चेतावनी दी, 'राजन, रुको! यह बालक छल करने आया है। यह तुम्हारा सर्वस्व छीन लेगा। अपना वचन वापस ले लो।'
पर राजा बलि ने कहा, 'गुरुदेव, मैं भक्त प्रह्लाद का वंशज हूँ। वचन देकर पीछे हटना मेरे कुल का अपमान होगा। चाहे मेरा सब कुछ चला जाए, मैं अपना वचन नहीं तोडूंगा। जो भी परिणाम हो, मैं इन्हें तीन पग भूमि अवश्य दूँगा।'
एक पग में पृथ्वी, दूसरे में स्वर्ग और तीसरा कहाँ?
जैसे ही बलि ने संकल्प पूरा किया, वह छोटा सा ब्राह्मण बालक अपना आकार बढ़ाने लगा। देखते ही देखते उनका शरीर इतना विशाल हो गया कि आकाश भी छोटा लगने लगा। उन्होंने अपना विराट, 'त्रिविक्रम' रूप धारण कर लिया।
- पहला पग: भगवान वामन ने अपना पहला कदम उठाया और पूरी पृथ्वी को नाप लिया।
- दूसरा पग: उन्होंने अपना दूसरा कदम उठाया और पूरे स्वर्गलोक को नाप लिया।
अब उन्होंने राजा बलि से पूछा, 'राजन, मैंने अपने दो पगों में पृथ्वी और स्वर्ग, दोनों को नाप लिया है। अब बताओ, अपना तीसरा पग कहाँ रखूँ? तुम्हारा वचन झूठा हो रहा है।'
राजा बलि का अहंकार टूट चुका था। वे भगवान की महिमा को समझ गए थे। उन्होंने बिना किसी भय या संकोच के, हाथ जोड़कर अपना सिर झुका दिया और कहा, 'प्रभु, इस संसार में शरीर पर मेरा अधिकार है। आप अपना तीसरा पग मेरे मस्तक पर रखिए।'
यह बलि का सर्वोच्च समर्पण था। उन्होंने अपना राज्य ही नहीं, अपना 'मैं' भी भगवान को अर्पित कर दिया। उनके इस निस्वार्थ भाव और वचनबद्धता को देखकर भगवान विष्णु अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने अपना तीसरा पग बलि के सिर पर रखा और उन्हें पाताल लोक का राजा बना दिया। साथ ही, उन्होंने बलि को वरदान दिया कि वे स्वयं उनके द्वारपाल बनकर पाताल लोक में रहेंगे।
दिवाली और बलि प्रतिपदा का संबंध
भगवान विष्णु ने राजा बलि की भक्ति और दानशीलता से प्रसन्न होकर उन्हें एक और वरदान दिया। उन्होंने कहा, 'हे बलि, तुम्हारी प्रजा तुमसे बहुत प्रेम करती है। तुम हर साल एक बार पृथ्वी पर आकर अपनी प्रजा से मिल सकोगे और यह देख सकोगे कि वे सुखी हैं।'
माना जाता है कि दिवाली के समय ही वे तीन दिन होते हैं जब राजा बलि पाताल लोक से पृथ्वी पर आते हैं। विशेष रूप से, 'बलि प्रतिपदा' का दिन, जो दिवाली के अगले दिन (गोवर्धन पूजा के साथ) मनाया जाता है, पूरी तरह से राजा बलि को समर्पित है। इस दिन लोग अपने घरों को दीयों से सजाते हैं, ताकि उनके प्रिय राजा जब धरती पर आएं, तो उन्हें हर तरफ प्रकाश और समृद्धि दिखाई दे। यह एक तरह से राजा बलि को यह संदेश देना है कि 'हे राजन, आपके जाने के बाद भी हम सुखी और संपन्न हैं।'
महाराष्ट्र, कर्नाटक, और दक्षिण भारत के कई राज्यों में इस दिन बलि की पूजा का विशेष विधान है। लोग अपने घर के आँगन में बलि की आकृति बनाकर उनका पूजन करते हैं और उनके न्यायप्रिय शासन को याद करते हैं।
निष्कर्ष: राजा बलि की कथा से हम क्या सीखें?
राजा बलि की कथा सिर्फ एक पौराणिक कहानी नहीं है, यह आज के जीवन के लिए भी बहुत प्रासंगिक है।
- वचन का सम्मान: आज के समय में जहाँ लोग आसानी से अपने वादे तोड़ देते हैं, राजा बलि हमें सिखाते हैं कि अपने वचन का मान रखना कितना ज़रूरी है, भले ही उसकी कीमत अपना सर्वस्व ही क्यों न हो।
- अहंकार का त्याग: बलि शक्तिशाली थे, लेकिन जब उन्हें सत्य का ज्ञान हुआ, तो उन्होंने अपना अहंकार त्यागकर भगवान के सामने समर्पण कर दिया। सच्ची महानता शक्ति में नहीं, विनम्रता में है।
- भक्ति का सच्चा अर्थ: यह कथा बताती है कि ईश्वर जन्म या कुल नहीं देखता, वह केवल भक्त का भाव और उसकी श्रद्धा देखता है। एक असुर कुल में जन्म लेकर भी बलि भगवान के सबसे प्रिय भक्तों में से एक बन गए।
इस दिवाली जब आप दीपक जलाएं, तो माँ लक्ष्मी के साथ उस महान असुर राजा बलि को भी याद करें, जिसने हमें सिखाया कि दानशीलता, वचनबद्धता और समर्पण का मार्ग ही व्यक्ति को भगवान के करीब ले जाता है। यह त्योहार हमें याद दिलाता है कि अच्छाई और भक्ति किसी एक समुदाय या वर्ग तक सीमित नहीं है।
