क्या आपने कभी गिलहरी की पीठ को ध्यान से देखा है?
जब भी हम अपने आसपास किसी गिलहरी को फुदकते हुए देखते हैं, तो उसकी पीठ पर बनी तीन सफेद धारियां हमारा ध्यान खींचती हैं। ये धारियां इतनी साफ और सुंदर होती हैं कि मन में सवाल उठता है - आखिर ये निशान कैसे बने? क्या ये हमेशा से थे? हमारे धर्मग्रंथों में इस छोटे से जीव से जुड़ी एक बहुत ही प्यारी और गहरी सीख देने वाली कहानी है। यह कहानी हमें उस समय में ले जाती है जब माता सीता को रावण की कैद से छुड़ाने के लिए भगवान श्री राम अपनी वानर सेना के साथ समुद्र पर पुल बना रहे थे।
यह कथा सिर्फ एक कहानी नहीं है, बल्कि यह हमें सिखाती है कि भक्ति और सेवा का असली मतलब क्या होता है। यह बताती है कि ईश्वर की नजर में कोई भी प्रयास छोटा या बड़ा नहीं होता, बस करने वाले का दिल सच्चा होना चाहिए। आइए, आज हम सब मिलकर उस अद्भुत घटना को याद करें, जब एक नन्ही सी गिलहरी ने प्रभु श्री राम का दिल जीत लिया और हमेशा के लिए अमर हो गई।
राम सेतु का विशाल निर्माण और वानर सेना का जोश
माता सीता का पता लगने के बाद, सबसे बड़ी चुनौती थी विशाल समुद्र को पार करके लंका पहुंचना। जामवंत जी के कहने पर, प्रभु श्री राम ने समुद्र देव से रास्ता देने की प्रार्थना की, और जब वे नहीं माने, तो प्रभु ने अपने बाण से समुद्र को सुखाने की चेतावनी दी। तब समुद्र देव प्रकट हुए और उन्होंने बताया कि उनकी सेना में नल और नील नाम के दो वानर हैं, जिन्हें श्राप के कारण यह वरदान मिला है कि उनके हाथ से फेंकी गई कोई भी चीज़ पानी में डूबेगी नहीं।
बस फिर क्या था! प्रभु श्री राम का आदेश मिलते ही पूरी वानर सेना दोगुने जोश के साथ काम में जुट गई। हनुमान जी, अंगद, सुग्रीव और जामवंत जैसे महाबली वानर बड़े-बड़े पहाड़ उठाकर ला रहे थे। नल और नील अपनी अद्भुत कारीगरी से उन चट्टानों को समुद्र में स्थापित कर रहे थे। चारों ओर केवल 'जय श्री राम' का जयघोष सुनाई दे रहा था। हर कोई अपनी पूरी ताकत और श्रद्धा से इस महान काम में अपना योगदान दे रहा था। किसी के मन में थकान नहीं थी, बस एक ही धुन थी - जल्द से जल्द पुल तैयार हो और हम लंका पहुंचकर माता सीता को वापस लाएं।

यह दृश्य सचमुच देखने लायक था। कोई विशाल पेड़ उखाड़ कर ला रहा था, तो कोई बड़ी-बड़ी चट्टानें। ऐसा लग रहा था मानो प्रकृति की सारी शक्ति भगवान राम की मदद के लिए एक साथ आ गई हो। हर कोई अपनी क्षमता के अनुसार सबसे बड़ा और सबसे भारी पत्थर लाने की कोशिश कर रहा था, ताकि वह प्रभु की नजरों में सबसे अच्छी सेवा कर सके।
एक नन्ही गिलहरी का असीम समर्पण
उसी विशाल वानर सेना के बीच एक छोटी सी गिलहरी भी थी। वह इन महाबली वानरों को देख रही थी और उसके मन में भी प्रभु राम के काम में हाथ बंटाने की इच्छा जागी। पर वह सोच में पड़ गई, 'मैं तो इतनी छोटी हूँ, न तो मैं पहाड़ उठा सकती हूँ और न ही बड़े पत्थर। मैं अपने प्रभु की मदद कैसे करूं?'
लेकिन उसका दिल मानने को तैयार नहीं था। उसकी भक्ति सच्ची थी। उसने एक उपाय सोचा। वह दौड़कर समुद्र के पानी में जाती, खुद को पूरा भिगो लेती। फिर गीले शरीर से दौड़कर रेत पर लेट जाती, जिससे रेत उसके रोएंदार शरीर पर चिपक जाती। इसके बाद वह भागकर उस जगह जाती जहां पुल बन रहा था और वहां जाकर अपने शरीर को झाड़ देती। उसके शरीर से चिपके रेत के जितने भी कण गिरते, वे बड़े-बड़े पत्थरों के बीच की दरारों में भर जाते।
जब दूसरों ने उड़ाया मज़ाक
वह लगातार यही करती रही - पानी में जाना, रेत में लेटना और फिर पुल पर आकर रेत झाड़ देना। कुछ बड़े वानरों ने जब उसे ऐसा करते देखा तो वे हंसने लगे। एक वानर ने उसे टोकते हुए कहा, 'अरे नन्ही गिलहरी, तुम यह क्या कर रही हो? हटो रास्ते से, कहीं हमारे पैरों के नीचे आकर कुचल न जाओ। तुम्हारे इन दो-चार कण रेत से क्या होगा? देखो, हम कितने बड़े-बड़े पहाड़ उठाकर ला रहे हैं। यह कोई बच्चों का खेल नहीं है।'
यह सुनकर गिलहरी को बहुत दुख हुआ, लेकिन उसने अपना काम नहीं छोड़ा। उसकी आँखों में आंसू थे, पर मन में प्रभु राम के लिए सेवा का भाव था। वह बिना किसी की बात सुने, अपनी धुन में लगी रही। वह सोच रही थी कि भले ही मेरा प्रयास छोटा है, पर है तो मेरे राम के लिए ही।
जब श्री राम ने सिखाया सेवा का सच्चा अर्थ
प्रभु श्री राम दूर खड़े यह सब देख रहे थे। उनकी नजरों से कुछ भी छिपा नहीं था। उन्होंने देखा कि कैसे वानर उस छोटी सी गिलहरी का मज़ाक उड़ा रहे हैं और कैसे वह गिलहरी बिना रुके, पूरी लगन से अपना काम कर रही है। भगवान राम उस गिलहरी के पास गए और उसे बहुत प्यार से अपने हाथों में उठा लिया।
उन्होंने सभी वानरों को अपने पास बुलाया और कहा, 'आप सब बहुत बलशाली हैं और आपकी सेवा सराहनीय है। आप बड़े-बड़े पर्वत उठाकर ला रहे हैं, जिससे इस पुल की नींव बन रही है। लेकिन क्या आपने इस गिलहरी के काम को ध्यान से देखा?'
भगवान ने समझाया, 'आप जो बड़े-बड़े पत्थर रख रहे हैं, उनके बीच में जो छोटी-छोटी दरारें रह जाती हैं, यह गिलहरी अपने शरीर पर रेत चिपका कर लाती है और उन दरारों को भर रही है। इसके लाए हुए रेत के कण इन पत्थरों को आपस में जोड़ने का काम कर रहे हैं, जिससे यह पुल और भी ज़्यादा मज़बूत बन रहा है। इसका प्रयास भले ही छोटा दिखे, पर इसका महत्व किसी से कम नहीं है।'
उन्होंने आगे कहा, 'याद रखो, सेवा छोटी या बड़ी नहीं होती। सेवा में यह नहीं देखा जाता कि किसने कितना काम किया, बल्कि यह देखा जाता है कि किसने किस भाव और कितनी श्रद्धा से किया। इस नन्ही गिलहरी ने अपनी पूरी क्षमता और सच्चे दिल से यह काम किया है, इसलिए इसकी सेवा आप सभी के बराबर है।'
प्रभु के स्नेह का अमर निशान
भगवान राम की बातें सुनकर सभी वानरों को अपनी गलती का एहसास हुआ। उन्हें समझ आ गया कि वे अपने बल के अहंकार में एक सच्ची भक्ति को पहचान नहीं पाए। सबने शर्म से सिर झुका लिया।
प्रभु राम उस गिलहरी के निस्वार्थ प्रेम और समर्पण से बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने अपना स्नेह जताने के लिए, अपनी उंगलियों से बहुत प्यार से उसकी पीठ को सहलाया। कहते हैं कि भगवान राम की उंगलियों के निशान ही उन तीन सफेद धारियों के रूप में गिलहरी की पीठ पर हमेशा के लिए छप गए।
यह निशान केवल एक निशान नहीं, बल्कि प्रभु के आशीर्वाद का प्रतीक है। यह हमें हर पल याद दिलाता है कि जब भी कोई सच्चे मन से ईश्वर के काम में हाथ बंटाने की कोशिश करता है, तो ईश्वर उसे न केवल स्वीकार करते हैं, बल्कि पूरी दुनिया के सामने सम्मान भी देते हैं। तब से लेकर आज तक, हर गिलहरी अपनी पीठ पर प्रभु श्री राम के स्नेह का यह प्रतीक लेकर घूमती है।
निष्कर्ष: इस कथा से हम आज क्या सीख सकते हैं?
गिलहरी की यह कहानी हज़ारों साल पुरानी हो सकती है, लेकिन इसकी सीख आज भी उतनी ही प्रासंगिक है। आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में हम अक्सर अपनी तुलना दूसरों से करते हैं। हम देखते हैं कि कोई हमसे कितना ज़्यादा सफल है, कितना ज़्यादा कमा रहा है या समाज के लिए कितना बड़ा काम कर रहा है। ऐसे में हमें अपना प्रयास बहुत छोटा और बेकार लगने लगता है और हम निराश हो जाते हैं।
लेकिन यह कथा हमें सिखाती है कि हमें परिणाम या काम के आकार पर ध्यान नहीं देना चाहिए। महत्व इस बात का है कि हम जो भी कर रहे हैं, उसे कितनी ईमानदारी, लगन और अच्छे इरादे से कर रहे हैं।
- 'समाज के लिए एक छोटा सा दान देना'
- 'अपने परिवार के लिए समय निकालना'
- 'किसी उदास मित्र को सांत्वना देना'
- 'अपने काम को पूरी ईमानदारी से करना'
यह सब उस गिलहरी के रेत के कणों की तरह ही है, जो शायद पहली नजर में छोटे लगें, पर दुनिया को बेहतर बनाने में अपना महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। ईश्वर आपकी दौलत या ताकत नहीं देखते, वे सिर्फ आपके दिल का भाव देखते हैं। इसलिए, अगली बार जब आपको लगे कि आपका प्रयास बहुत छोटा है, तो उस नन्ही गिलहरी को याद करियेगा, जिसकी सच्ची सेवा ने सीधे भगवान का दिल जीत लिया था।
