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कैलाश पर्वत पर आज तक कोई क्यों नहीं चढ़ पाया?

कैलाश पर्वत पर आज तक कोई क्यों नहीं चढ़ पाया?

दुनिया की सबसे ऊँची चोटी माउंट एवरेस्ट की ऊँचाई 8,848 मीटर है, जहाँ अब तक हज़ारों पर्वतारोही अपने कदम रख चुके हैं। वहीं दूसरी ओर, तिब्बत के बर्फीले पठार पर स्थित कैलाश पर्वत की ऊँचाई महज़ 6,638 मीटर है। फिर भी आज तक कोई भी इंसान इस चोटी पर चढ़ने में सफल नहीं हो पाया।

जो भी व्यक्ति इस रहस्यमयी पर्वत की चोटी तक पहुँचने के इरादे से आगे बढ़ा, उसे या तो अपनी दिशा भूलनी पड़ी या फिर अचानक बदले ख़राब मौसम के कारण जान बचाकर वापस लौटना पड़ा। आख़िर ऐसा क्यों है कि विज्ञान और तकनीक के इस दौर में भी कैलाश पर्वत अजेय बना हुआ है? आइए, इस पावन पर्वत से जुड़े धार्मिक विश्वासों, पर्वतारोहियों के अनुभवों और इसके अनसुलझे रहस्यों को विस्तार से समझते हैं।

कैलाश पर्वत की पिरामिड जैसी बर्फ से ढकी चोटी और उसके सामने नीले पानी वाली मानसरोवर झील का शांत विहंगम दृश्य

धार्मिक मान्यता: देवाधिदेव महादेव का अलौकिक धाम

सनातन धर्म में कैलाश पर्वत को केवल पत्थरों और बर्फ का ढेर नहीं, बल्कि साक्षात भगवान शिव और माता पार्वती का स्थायी निवास माना जाता है। पुराणों के अनुसार, यह पर्वत ब्रह्मांड का केंद्र यानी 'मेरु पर्वत' है, जो पृथ्वी को स्वर्ग से जोड़ता है।

मान्यता है कि कैलाश की चोटी पर वही शक्ति जा सकती है जिसने अपने मन के सारे विकारों, अहंकार और सांसारिक बंधनों को पूरी तरह भस्म कर दिया हो। एक साधारण मनुष्य अपने भौतिक शरीर और अहंकार के साथ भगवान शिव के ध्यान कक्ष में कदम नहीं रख सकता।

सिर्फ़ हिंदू धर्म ही नहीं, बल्कि कई अन्य परंपराओं में भी इस पर्वत का बहुत ऊँचा स्थान है:

  • बौद्ध धर्म: बौद्ध अनुयायी इसे 'कांग रिनपोचे' यानी बर्फ का बहुमूल्य रत्न कहते हैं और इसे चक्रसंवर बुद्ध का पवित्र निवास मानते हैं।
  • जैन धर्म: जैन परंपरा में इसे 'अष्टापद' कहा जाता है, जहाँ प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव ने मोक्ष प्राप्त किया था।
  • बोन परंपरा: तिब्बत के प्राचीन बोन धर्म के लोग इसे नौ मंजिला स्वास्तिक पर्वत मानते हैं, जो उनकी पूरी आध्यात्मिक शक्ति का केंद्र है।

इन सभी परंपराओं में एक बात बिल्कुल समान है—इस पर्वत की चोटी पर पैर रखना ईश्वर का अपमान माना जाता है। इसी कारण सदियों से श्रद्धालु पर्वत की चोटी पर चढ़ने के बजाय केवल इसकी परिक्रमा करते आ रहे हैं।

पर्वतारोहियों के अजीब अनुभव और समय की तेज़ गति

बीसवीं सदी में कई विदेशी पर्वतारोहियों और वैज्ञानिकों के दलों ने कैलाश पर्वत के रहस्यों को समझने और इस पर चढ़ाई करने की कोशिश की थी। इनमें से कई लोगों ने ऐसे अनुभव साझा किए जो सामान्य समझ से बिल्कुल परे हैं।

कैलाश पर्वत के क्षेत्र में जाने वाले यात्रियों और शोधकर्ताओं ने पाया कि यहाँ समय सामान्य दुनिया के मुकाबले बहुत तेज़ी से बीतता है। पर्वतारोहियों ने दर्ज किया कि पर्वत के नज़दीक पहुँचते ही उनके बाल और नाखून कुछ ही घंटों में इतने बढ़ गए, जितने आम तौर पर दो हफ़्तों में बढ़ते हैं। शरीर पर उम्र का असर अचानक बहुत तेज़ हो जाता है।

इसके अलावा, जिन पर्वतारोहियों ने ऊपर चढ़ने का रास्ता तलाशने की कोशिश की, उन्होंने बताया कि पर्वत के पास जाते ही दिशा बताने वाले यंत्र काम करना बंद कर देते हैं। चारों दिशाओं में बर्फ की दीवारें अचानक एक जैसी दिखने लगती हैं, और चढ़ाई करने वाले को ऐसा महसूस होता है जैसे कोई अदृश्य शक्ति उसे पीछे धकेल रही हो।

रूस के प्रसिद्ध नेत्र रोग विशेषज्ञ और वैज्ञानिक डॉ. अर्न्स्ट मुल्दाशेव ने अपनी टीम के साथ कैलाश पर गहरा शोध किया था। उनका मानना था कि कैलाश पर्वत प्राकृतिक पहाड़ न होकर एक विशालकाय प्राचीन पिरामिड की तरह बना हुआ है, जिसके भीतर शक्तिशाली ऊर्जा का भंडार सुरक्षित है।

क्या इतिहास में कभी कोई कैलाश की चोटी पर पहुँचा?

अगर इतिहास और लोककथाओं की बात करें, तो केवल एक ही महापुरुष का नाम सामने आता है जिनके कैलाश शिखर पर पहुँचने की बात मानी जाती है। वे थे 11वीं सदी के महान तिब्बती बौद्ध योगी और संत मिलारेपा।

कहा जाता है कि उस दौर में तिब्बत के प्राचीन बोन धर्म के एक तांत्रिक नरो बोन-चुंग के साथ संत मिलारेपा की आध्यात्मिक परीक्षा हुई थी। दोनों में यह तय हुआ कि जो भी सूर्य की पहली किरण के साथ कैलाश के शिखर पर पहले पहुँचेगा, वही इस क्षेत्र का मुख्य मार्गदर्शक माना जाएगा।

बोन तांत्रिक ने अपने अनुष्ठान शुरू किए, लेकिन संत मिलारेपा शांत भाव से ध्यान में लीन रहे। जैसे ही सुबह की पहली किरण कैलाश की बर्फीली चोटी से टकराई, मिलारेपा सूर्य की किरणों पर सवार होकर पलक झपकते ही शिखर पर पहुँच गए।

हालाँकि, चोटी से वापस लौटने के बाद संत मिलारेपा ने सभी मनुष्यों को यह सख्त चेतावनी दी कि कोई भी इंसान अपने भौतिक शरीर से इस शिखर को जीतने की कोशिश न करे। उन्होंने कहा कि यह स्थान सिर्फ़ ईश्वर की साधना के लिए है, इंसानी अहंकार की संतुष्टि के लिए नहीं।

कैलाश पर्वत की बनावट और इस पर लगी कानूनी रोक

धार्मिक और अलौकिक कारणों के साथ-साथ कैलाश पर्वत की बनावट भी पर्वतारोहण के लिहाज से बेहद कठिन है। इसकी चारों भुजाएँ दिशाओं (उत्तर, दक्षिण, पूर्व, पश्चिम) के एकदम सीध में हैं और इसकी ढलान लगभग 90 डिग्री सीधी खड़ी है।

यहाँ हर समय बर्फ़ीले तूफ़ान आते रहते हैं और पल भर में मौसम इतना बदल जाता है कि दिन में ही घोर अंधेरा छा जाता है। सीधी चट्टानों पर बर्फ़ की पतली परत जमी होती है, जहाँ किसी भी आधुनिक उपकरण की पकड़ बनना लगभग नामुमकिन है।

साल 2001 में स्पेन के पर्वतारोहियों के एक दल ने चीन सरकार से कैलाश पर चढ़ाई करने की विशेष अनुमति माँगी थी। जैसे ही यह ख़बर दुनिया भर में फैली, भारत, तिब्बत और दुनिया भर के करोड़ों श्रद्धालुओं ने इसका कड़ा विरोध किया। लोगों की गहरी धार्मिक भावनाओं का सम्मान करते हुए चीन सरकार ने इस अभियान पर रोक लगा दी।

इसके बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह कानून बना दिया गया कि कैलाश पर्वत पर किसी भी प्रकार के पर्वतारोहण की अनुमति नहीं दी जाएगी। आज यह पर्वत पूरी दुनिया में अपनी अछूती और पवित्र स्थिति के लिए सुरक्षित है।

आधुनिक जीवन के लिए सीख और निष्कर्ष

आज की तेज़ रफ़्तार ज़िंदगी में इंसान हर चीज़ पर जीत हासिल करना चाहता है। हम ऊँचे से ऊँचे पहाड़ों को नाप रहे हैं, समुद्र की गहराइयों में उतर रहे हैं और अंतरिक्ष तक पहुँच रहे हैं। हमारी आधुनिक सोच यह मानती है कि जिस चीज़ पर हम विजय पा लें, वही हमारी सफलता है।

लेकिन कैलाश पर्वत हमें जीवन का एक बहुत गहरा और सुंदर पाठ पढ़ाता है। कैलाश हमें सिखाता है कि प्रकृति और परमात्मा की कुछ रचनाएँ जीतने के लिए नहीं, बल्कि उनके आगे अपना सिर झुकाने और नमन करने के लिए होती हैं।

भारतीय संस्कृति में इसीलिए कैलाश की चढ़ाई करने के बजाय उसकी 'परिक्रमा' करने का नियम बनाया गया। परिक्रमा का मतलब है—स्वयं को केंद्र में रखने के बजाय परमात्मा को केंद्र में रखना और अपनी सीमाओं को पहचानना। जब हम अपने जीवन में अहंकार छोड़कर विनम्रता से झुकना सीख जाते हैं, तभी हम वास्तविक शांति और आनंद का अनुभव कर पाते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

क्या कैलाश पर्वत पर चढ़ाई करना गैरकानूनी है?

हाँ, दुनिया भर के श्रद्धालुओं की धार्मिक भावनाओं का सम्मान करते हुए सरकार ने कैलाश पर्वत पर चढ़ाई करने पर पूरी तरह से कानूनी प्रतिबंध लगा रखा है।

कैलाश पर्वत की ऊँचाई माउंट एवरेस्ट से कम होने पर भी इस पर चढ़ना कठिन क्यों है?

कैलाश पर्वत की ढलानें बिल्कुल सीधी और खड़ी हैं, जहाँ साल भर अचानक भयानक बर्फीले तूफ़ान आते रहते हैं। इसके अलावा यहाँ दिशा भ्रम और तेज़ शारीरिक थकान जैसे रहस्यमयी बदलाव महसूस होते हैं।

क्या वास्तव में कैलाश के पास उम्र तेज़ी से बढ़ती है?

वहाँ गए कई शोधकर्ताओं और यात्रियों ने अपने संस्मरणों में लिखा है कि पर्वत के पास बाल और नाखून बहुत तेज़ी से बढ़ते हैं, जिसे इस क्षेत्र में मौजूद विशेष ऊर्जा का असर माना जाता है।