कंस के मन में डर का पहला बीज: एक आकाशवाणी
यह कथा उस समय से शुरू होती है जब कंस की प्यारी बहन देवकी का विवाह वासुदेव से हो रहा था। कंस अपनी बहन से बहुत स्नेह करता था और खुद ही रथ चलाकर उसे ससुराल विदा करने जा रहा था। माहौल खुशियों से भरा था, पर तभी अचानक आसमान में बिजली कड़की और एक आकाशवाणी हुई। उस दिव्य आवाज़ ने कहा, 'हे कंस, जिस बहन को तू इतने प्यार से विदा कर रहा है, उसी की आठवीं संतान तेरे अंत का कारण बनेगी।'
यह सुनते ही कंस का सारा प्रेम पल भर में गायब हो गया। वह डर और गुस्से से भर गया। उसने तुरंत अपनी तलवार निकाली और देवकी को मारने के लिए आगे बढ़ा। तब वासुदेव ने उसे रोकते हुए विनती की, 'राजन, देवकी से आपको कोई खतरा नहीं है। खतरा तो उसकी संतान से है। मैं वचन देता हूँ कि हम अपनी हर संतान को जन्म लेते ही तुम्हें सौंप देंगे।' कंस को यह बात ठीक लगी और उसने दोनों को मारने की बजाय मथुरा के कारागार में डाल दिया।

कारागार का अंधकार और दिव्य ज्योति का जन्म
कंस ने अपने वचन के अनुसार देवकी और वासुदेव को जेल में बंद कर दिया। जैसे ही देवकी ने अपनी पहली संतान को जन्म दिया, कंस ने उसे बेरहमी से पत्थर पर पटक कर मार डाला। इस तरह उसने एक-एक करके देवकी की छह संतानों की हत्या कर दी। उसका अत्याचार बढ़ता ही जा रहा था और चारों ओर अधर्म का बोलबाला था।
जब सातवें गर्भ की रक्षा हुई
जब देवकी सातवीं बार गर्भवती हुईं, तो भगवान ने योगमाया की मदद से उस गर्भ को वासुदेव की दूसरी पत्नी रोहिणी के गर्भ में स्थापित कर दिया, जो गोकुल में नंद बाबा के यहां रह रही थीं। इन्हीं से बलराम का जन्म हुआ, जो शेषनाग के अवतार थे। कंस को लगा कि देवकी का सातवां गर्भ नष्ट हो गया है।
श्री कृष्ण का प्राकट्य
फिर वह घड़ी आई जिसका सभी को इंतज़ार था। भाद्रपद महीने के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रोहिणी नक्षत्र में, देवकी की आठवीं संतान के रूप में स्वयं भगवान विष्णु ने कृष्ण के रूप में जन्म लिया। उनके जन्म लेते ही कारागार में एक दिव्य प्रकाश फैल गया। सारे पहरेदार गहरी नींद में सो गए, वासुदेव और देवकी की बेड़ियाँ अपने आप खुल गईं और जेल के दरवाज़े भी खुल गए।
उसी समय भगवान ने वासुदेव को आदेश दिया कि वे उन्हें तुरंत गोकुल में नंद बाबा के घर छोड़ आएं और वहां जन्मी कन्या को अपने साथ ले आएं। वासुदेव ने नन्हे कृष्ण को एक टोकरी में रखा और घनघोर बारिश और तूफ़ान में उफनती यमुना नदी को पार करने के लिए निकल पड़े।
कहते हैं कि जैसे ही वासुदेव ने नदी में पैर रखा, यमुना का जल शांत होने लगा और शेषनाग ने अपने फन फैलाकर बालक कृष्ण को बारिश से बचाया। वासुदेव सुरक्षित रूप से गोकुल पहुंचे, कृष्ण को यशोदा के पास सुलाया और वहां से नवजात कन्या को लेकर वापस मथुरा के कारागार में आ गए। उनके आते ही जेल के दरवाज़े फिर से बंद हो गए और बेड़ियाँ लग गईं।
गोकुल में आनंद और कंस के असफल प्रयास
जब कंस को आठवीं संतान के जन्म की सूचना मिली, तो वह तुरंत कारागार पहुंचा। उसने उस कन्या को भी छीनकर पत्थर पर पटकना चाहा, पर वह बच्ची उसके हाथ से छूटकर आसमान में चली गई और देवी के रूप में प्रकट होकर बोली, 'मूर्ख कंस! मुझे मारने से क्या होगा? तुझे मारने वाला तो गोकुल में पहुंच चुका है।'
यह जानकर कंस का डर और भी बढ़ गया। उसने अपने सबसे शक्तिशाली राक्षसों को कृष्ण को मारने के लिए गोकुल भेजना शुरू कर दिया। सबसे पहले उसने पूतना राक्षसी को भेजा, जिसने अपने स्तनों पर विष लगाकर कृष्ण को मारने की कोशिश की, पर बाल कृष्ण ने दूध पीते-पीते उसके प्राण ही हर लिए। इसके बाद तृणावर्त, बकासुर, अघासुर जैसे कई दैत्यों को भेजा गया, पर कृष्ण ने अपनी लीलाओं से उन सभी का अंत कर दिया। हर बार कंस का प्रयास असफल होता और उसका क्रोध बढ़ता जाता।
मथुरा का बुलावा और अधर्म का अंत
जब कृष्ण और बलराम थोड़े बड़े हुए, तो कंस ने उन्हें मारने के लिए एक और योजना बनाई। उसने मथुरा में एक धनुष-यज्ञ का आयोजन किया और अक्रूर जी को भेजकर दोनों भाइयों को मथुरा आने का निमंत्रण दिया। उसकी योजना थी कि जैसे ही कृष्ण और बलराम मथुरा में प्रवेश करेंगे, उन्हें कुवलयापीड़ नाम के एक पागल हाथी से कुचलवा दिया जाएगा। अगर वे उससे बच गए, तो चाणूर और मुष्टिक जैसे महाबली पहलवान उन्हें मल्लयुद्ध में मार देंगे।
लेकिन भगवान की लीला कुछ और ही थी। कृष्ण और बलराम ने मथुरा पहुंचकर उस हाथी का वध कर दिया। इसके बाद उन्होंने खेल-खेल में ही चाणूर और मुष्टिक जैसे पहलवानों को भी यमलोक पहुंचा दिया। अपने सभी शक्तिशाली योद्धाओं को मरते देख कंस का धैर्य जवाब दे गया। वह सिंहासन से चिल्लाया, 'इन दोनों बालकों को बंदी बना लो! वासुदेव, देवकी और नंद को भी मार डालो!'
कंस का आदेश सुनते ही भगवान कृष्ण तुरंत उछलकर उसके सिंहासन पर जा पहुंचे। उन्होंने कंस के बाल पकड़कर उसे नीचे खींच लिया और धरती पर पटक दिया। बस एक ही प्रहार में कंस के प्राण निकल गए। इस तरह भगवान कृष्ण ने न केवल अपने माता-पिता को अत्याचारी कंस के चंगुल से छुड़ाया, बल्कि मथुरा की प्रजा को भी उसके आतंक से मुक्ति दिलाई।
निष्कर्ष: यह वध क्यों ज़रूरी था?
भगवान कृष्ण का कंस को मारना कोई व्यक्तिगत दुश्मनी या बदला नहीं था। यह धर्म की स्थापना के लिए एक ज़रूरी कदम था। कंस अधर्म, अहंकार और अत्याचार का प्रतीक बन चुका था। उसने अपनी प्रजा, अपने पिता और अपनी बहन पर अनगिनत ज़ुल्म किए थे। उसका अंत करके भगवान ने यह संदेश दिया कि जब-जब धरती पर अधर्म बढ़ता है, तो उसे मिटाने के लिए परमात्मा को कठोर कदम भी उठाने पड़ते हैं।
आज के जीवन में यह कहानी हमें सिखाती है कि अन्याय और अत्याचार का विरोध करना ज़रूरी है, चाहे अत्याचारी कोई अपना ही क्यों न हो। यह हमें अपने अंदर के 'कंस' यानी हमारे अहंकार, क्रोध और डर को खत्म करने की भी प्रेरणा देती है। जिस तरह कृष्ण ने मथुरा को कंस के भय से मुक्त किया, उसी तरह हमें भी अपने मन को नकारात्मकता से मुक्त करके धर्म और सच्चाई के रास्ते पर चलना चाहिए।
