बचपन में जब भी हम अपने माता-पिता या दादा-दादी के साथ मंदिर जाते थे, तो एक बात अक्सर देखने को मिलती थी। गर्भग्रह में भगवान के दर्शन करने और परिक्रमा पूरी करने के बाद, बड़े-बुजुर्ग हमेशा कहते थे कि चलो बाहर सीढ़ियों पर दो मिनट बैठते हैं।
उस समय यह बात बहुत सामान्य लगती थी। मन में आता था कि शायद चलते-चलते पैर थक गए होंगे, इसलिए आराम करने के लिए बैठ रहे हैं। पर हिंदू धर्म में मंदिर से जुड़ी किसी भी परंपरा के पीछे सिर्फ शारीरिक आराम नहीं, बल्कि बहुत गहरा आध्यात्मिक और मानसिक कारण छिपा होता है।
मंदिर की सीढ़ियों पर थोड़ी देर शांत बैठकर रुकना सिर्फ एक औपचारिकता नहीं है। यह मन को संभालने और ईश्वर के पास से कुछ खास लेकर लौटने का एक बहुत सुंदर तरीका है।
सीढ़ियों पर बैठकर मांगी जाने वाली वह खास प्रार्थना
अक्सर लोग मंदिर के अंदर भगवान के सामने हाथ जोड़कर लंबी सूची रख देते हैं। कोई नौकरी मांगता है, कोई परिवार की सुख-शांति मांगता है, तो कोई धन-दौलत मांगता है। पर हमारे बुजुर्ग बताते हैं कि मंदिर के भीतर सांसारिक चीजें भले मांग ली जाएं, असली प्रार्थना तो बाहर सीढ़ियों पर बैठकर की जाती है।
शास्त्रों की पुरानी मान्यता के अनुसार, मंदिर की सीढ़ियों पर बैठकर ईश्वर से दुनिया की कोई चीज नहीं मांगी जाती। वहाँ बैठकर केवल अपने जीवन के अंत और आत्म-सम्मान की प्रार्थना की जाती है। इसके लिए एक बहुत पुराना और प्रसिद्ध श्लोक बोलने की परंपरा रही है।
अनायासेन मरणं विनादैन्येन जीवनम्।
देहान्ते तव सायुज्यं देहि मे परमेश्वरम्॥
इस श्लोक का अर्थ इतना गहरा और सुंदर है कि यह मन को पूरी तरह छू लेता है। इसमें भक्त ईश्वर से तीन बहुत सरल लेकिन अनमोल बातें मांगता है:
- अनायासेन मरणं: हे प्रभु, जब भी मेरा अंतिम समय आए, मुझे कोई कष्ट न हो, मैं बिना तड़पे और बिना किसी लंबी बीमारी के इस संसार से विदा लूँ।
- विनादैन्येन जीवनम्: जब तक मैं जीवित रहूँ, मुझे कभी किसी के आगे हाथ न फैलाना पड़े, मेरा जीवन लाचारी और बेबसी में न बीते।
- देहान्ते तव सायुज्यं: और जब यह शरीर छूटे, तो मेरी आत्मा को आपके चरणों में स्थान मिले।
ज़रा सोचिए, जिसने ये तीन चीजें मांग लीं, उसके जीवन में चिंता के लिए कोई जगह ही नहीं बचती। सीढ़ियों पर बैठकर इस भाव को मन में दोहराना हमें लालच से मुक्त करता है।

मंदिर की शांति और ऊर्जा को अपने भीतर समेटना
जब हम मंदिर के अंदर जाते हैं, तो वहाँ का वातावरण बाहर की दुनिया से बिल्कुल अलग होता है। धूप-दीप की सुगंध, घंटियों की गूँज, मंत्रों की ध्वनि और सैकड़ों सालों से चली आ रही भक्ति की वजह से वहाँ एक बहुत सकारात्मक ऊर्जा होती है। उस माहौल में हमारा अशांत मन धीरे-धीरे शांत होने लगता है।
अगर हम दर्शन करते ही तुरंत मंदिर से बाहर निकलकर अपनी गाड़ी या सड़क के शोरगुल में चले जाएं, तो वह मानसिक शांति तुरंत गायब हो जाती है। हमारा दिमाग एक झटके में फिर से रोज की आपाधापी में उलझ जाता है।
सीढ़ियों पर कुछ पल बैठना एक तरह का ठहराव है। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे तेज धूप से आकर हम थोड़ी देर पंखे की छांव में सुस्ताते हैं। सीढ़ियों पर बैठकर हम मंदिर के उस शांत वातावरण को अपनी सांसों और विचारों में उतरने का समय देते हैं।
सीढ़ियों पर बैठते समय किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?
अक्सर देखा जाता है कि लोग सीढ़ियों पर बैठ तो जाते हैं, लेकिन वहाँ बैठकर भी दुनियादारी की बातें शुरू कर देते हैं। कोई अपने घर-परिवार की चर्चा करने लगता है, तो कोई मोबाइल निकालकर फोन पर बात करने लगता है। परंपरा के अनुसार यह तरीका सही नहीं माना जाता।
मंदिर की सीढ़ियों पर बैठने का पूरा लाभ तभी मिलता है जब हम कुछ सामान्य नियमों का ध्यान रखें:
- मौन रहें: सीढ़ियों पर बैठकर गपशप या किसी की बुराई बिल्कुल न करें। कम से कम दो मिनट पूरी तरह चुप रहकर अपने मन को देखें।
- ईश्वर की छवि का ध्यान करें: आँखें बंद करके यह महसूस करें कि अभी आपने गर्भग्रह में भगवान का जो रूप देखा था, वह आपके मन में कितना गहरा उतर पाया है।
- फोन का उपयोग न करें: सीढ़ियों पर बैठकर सोशल मीडिया देखना या फोन कॉल उठाना मंदिर की मर्यादा के अनुकूल नहीं माना जाता।
- आने-जाने वालों का रास्ता न रोकें: सीढ़ियों के बिल्कुल बीच में बैठने के बजाय एक किनारे बैठें, ताकि दूसरे दर्शनार्थियों को परेशानी न हो।
इन छोटी-छोटी बातों का ध्यान रखने से मंदिर जाने का असली उद्देश्य पूरा होता है और मन सचमुच हल्का महसूस करता है।
आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में इस परंपरा की सीख
आज हमारी जिंदगी इतनी तेज हो चुकी है कि हमारे पास ठहरने की फुर्सत ही नहीं है। हम हर काम जल्दी में करते हैं — जल्दी में खाना, जल्दी में सफर करना और यहाँ तक कि भगवान के दर्शन भी हम घड़ी देखकर दौड़ते हुए करते हैं। भागते हुए आए, हाथ जोड़े और भागते हुए बाहर निकल गए।
मंदिर की सीढ़ियों पर बैठने की यह साधारण सी परंपरा हमें 'ठहरना' सिखाती है। यह हमें याद दिलाती है कि जिंदगी सिर्फ भागने का नाम नहीं है। किसी पवित्र जगह पर जाकर कुछ देर बिना किसी मतलब के शांत बैठना भी अपने आप में एक बहुत बड़ी प्रार्थना है।
जब आप दर्शन के बाद सीढ़ियों पर दो मिनट मौन बैठते हैं, तो आप खुद को अपनी चिंताओं से अलग करके देख पाते हैं। आप यह समझ पाते हैं कि दुनिया की परेशानियां अपनी जगह हैं, पर भीतर की शांति सबसे अनमोल है। अगली बार जब भी आप मंदिर जाएं, तो दर्शन करके तुरंत लौटने की जल्दी मत कीजिएगा। कुछ पल सीढ़ियों पर जरूर बैठिए और उस शांति को महसूस कीजिए।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
मंदिर की सीढ़ियों पर कितनी देर बैठना चाहिए?
इसके लिए कोई तय समय नहीं है, लेकिन कम से कम दो से पांच मिनट तक शांत भाव से बैठना अच्छा माना जाता है।
क्या मंदिर की सीढ़ियों पर बैठकर बात कर सकते हैं?
सीढ़ियों पर बैठकर सांसारिक बातें या गपशप करने से बचना चाहिए। यह समय केवल आत्मचिंतन, ईश्वर के ध्यान और मौन रहने के लिए होता है।
सीढ़ियों पर बैठते समय मुख किस दिशा में होना चाहिए?
परंपरा के अनुसार बैठते समय मुख मंदिर के मुख्य द्वार या भगवान की प्रतिमा की दिशा में रखना सबसे अच्छा माना जाता है।
क्या हर मंदिर के दर्शन के बाद सीढ़ियों पर बैठना जरूरी है?
हाँ, परंपरा के अनुसार किसी भी देवालय में दर्शन करने के बाद थोड़ी देर सीढ़ियों या प्रांगण में बैठकर मन को शांत करना बहुत शुभ माना जाता है।



