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ॐ जय जगदीश हरे: किसने लिखी यह आरती और क्या है इसका असली मतलब?

ॐ जय जगदीश हरे: किसने लिखी यह आरती और क्या है इसका असली मतलब?

शाम का समय, घर का मंदिर, हल्की-सी अगरबत्ती की सुगंध और एक सुर में गाता हुआ पूरा परिवार... 'ॐ जय जगदीश हरे'। यह एक ऐसा दृश्य है जो भारत के लगभग हर हिंदू घर में कभी न कभी साकार होता है। यह आरती हमारे पूजा-पाठ का एक अटूट हिस्सा बन चुकी है। बचपन से हम इसे सुनते और गाते आए हैं। पर क्या आपने कभी यह सोचा है कि यह सरल लेकिन दिल को छू लेने वाले शब्द किसने लिखे? यह सिर्फ़ भगवान की प्रशंसा के कुछ वाक्य नहीं हैं, बल्कि इनमें हिंदू दर्शन का गहरा सार छिपा है।

आज हम इस पवित्र आरती की कहानी में थोड़ा और गहराई से उतरेंगे। हम जानेंगे कि इसके रचयिता कौन थे और इसके हर एक शब्द का हमारे जीवन के लिए क्या संदेश है। यह यात्रा आपको इस आरती को एक नए नज़रिए से देखने में मदद करेगी।

आरती के रचयिता: कौन थे पंडित श्रद्धाराम फिल्लौरी?

यह जानकर शायद आपको हैरानी हो कि यह विश्वप्रसिद्ध आरती किसी बहुत पुराने ऋषि-मुनि ने नहीं, बल्कि आज से लगभग 150 साल पहले एक महान विचारक और समाज सुधारक ने लिखी थी। इनका नाम था पंडित श्रद्धाराम फिल्लौरी। उनका जन्म 1837 में पंजाब के जालंधर ज़िले के फिल्लौर शहर में हुआ था।

पंडित श्रद्धाराम जी सिर्फ़ एक भजन लिखने वाले नहीं थे, बल्कि वे अपने समय से बहुत आगे की सोच रखने वाले इंसान थे। वे एक बेहतरीन लेखक, ज्योतिषी, संगीतकार और स्वतंत्रता संग्राम के समर्थक थे। उन्होंने हिंदी साहित्य का पहला उपन्यास माना जाने वाला 'भाग्यवती' भी लिखा, जिसमें उन्होंने महिलाओं की शिक्षा और उनके अधिकारों की बात की थी।

माना जाता है कि उन्होंने 'ॐ जय जगदीश हरे' की रचना 1870 के आसपास की थी। उनका मकसद था कि हिंदू धर्म के गहरे सिद्धांतों और वेदांत के ज्ञान को इतने सरल शब्दों में पिरो दिया जाए कि आम इंसान भी उसे आसानी से गा सके और समझ सके। वे चाहते थे कि ईश्वर की प्रार्थना किसी एक देवी-देवता तक सीमित न रहे, बल्कि उस एक 'जगदीश' यानी पूरे जगत के स्वामी को समर्पित हो, जिसे हर कोई अपना मान सके। और हुआ भी यही, आज यह आरती हर संप्रदाय के लोग बिना किसी भेद-भाव के गाते हैं।

पंडित श्रद्धाराम फिल्लौरी का एक पुराना, सम्मानजनक चित्र या पेंटिंग, जिसमें वे लिखते हुए या सोचते हुए दिखाए गए हों

'ॐ जय जगदीश हरे' का पूरा पाठ और सरल अर्थ

चलिए, अब इस आरती के हर शब्द के पीछे छिपे सुंदर अर्थ को समझने की कोशिश करते हैं। यह आरती हमें ईश्वर के विशाल रूप और हमारी अपनी विनम्रता का एहसास कराती है।

ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे।
भक्त जनों के संकट, दास जनों के संकट, क्षण में दूर करे॥ ॐ जय जगदीश हरे॥

अर्थ: हे जगदीश, हे पूरे ब्रह्मांड के स्वामी, आपकी जय हो! आप अपने भक्तों और सेवकों के सभी दुखों को एक पल में ही दूर कर देते हैं।

जो ध्यावे फल पावे, दुःख बिनसे मन का, स्वामी दुःख बिनसे मन का।
सुख सम्पति घर आवे, सुख सम्पति घर आवे, कष्ट मिटे तन का॥ ॐ जय जगदीश हरे॥

अर्थ: हे स्वामी, जो भी आपका ध्यान करता है, उसे इच्छित फल मिलता है और उसके मन के सारे दुःख खत्म हो जाते हैं। आपके ध्यान से घर में सुख और समृद्धि आती है और शरीर के कष्ट भी मिट जाते हैं।

मात पिता तुम मेरे, शरण गहूँ मैं किसकी, स्वामी शरण गहूँ मैं किसकी।
तुम बिन और न दूजा, तुम बिन और न दूजा, आस करूँ मैं जिसकी॥ ॐ जय जगदीश हरे॥

अर्थ: आप ही मेरे माता और पिता हैं। आपके अलावा मैं किसकी शरण में जाऊँ? मेरे लिए आपके सिवा कोई दूसरा नहीं है, जिससे मैं कोई उम्मीद रख सकूँ। मेरी सारी आशाएँ आप ही से हैं।

तुम पूरण परमात्मा, तुम अन्तर्यामी, स्वामी तुम अन्तर्यामी।
पारब्रह्म परमेश्वर, पारब्रह्म परमेश्वर, तुम सब के स्वामी॥ ॐ जय जगदीश हरे॥

अर्थ: आप ही पूर्ण परमात्मा हैं और आप ही सबके मन की बात जानने वाले (अन्तर्यामी) हैं। आप ही पारब्रह्म (जो हर सीमा से परे है) और परमेश्वर हैं। आप ही हम सबके स्वामी हैं।

तुम करुणा के सागर, तुम पालनकर्ता, स्वामी तुम पालनकर्ता।
मैं मूरख खल कामी, मैं सेवक तुम स्वामी, कृपा करो भर्ता॥ ॐ जय जगदीश हरे॥

अर्थ: आप करुणा और दया के सागर हैं और आप ही इस पूरी सृष्टि का पालन-पोषण करते हैं। मैं तो एक मूर्ख, दुष्ट और वासनाओं से भरा हुआ इंसान हूँ। मैं आपका सेवक हूँ और आप मेरे स्वामी हैं। हे प्रभु, मुझ पर अपनी कृपा कीजिए।

तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति, स्वामी सबके प्राणपति।
किस विधि मिलूँ दयामय, किस विधि मिलूँ दयामय, तुमको मैं कुमति॥ ॐ जय जगदीश हरे॥

अर्थ: आप 'अगोचर' हैं, यानी जिसे हमारी इंद्रियाँ देख या महसूस नहीं कर सकतीं। आप ही सभी के प्राणों के स्वामी हैं। हे दया के सागर, मुझ जैसा कुमति (बुरी बुद्धि वाला) इंसान आपसे किस तरह मिल सकता है? कृपया रास्ता दिखाइए।

दीनबन्धु दुःखहर्ता, ठाकुर तुम मेरे, स्वामी ठाकुर तुम मेरे।
अपने हाथ उठाओ, अपनी शरण लगाओ, द्वार पड़ा तेरे॥ ॐ जय जगदीश हरे॥

अर्थ: आप दीनों (गरीबों और दुखियों) के साथी और उनके दुखों को हरने वाले हैं। आप ही मेरे ठाकुर (मालिक) हैं। कृपा करके अपना हाथ मेरे सिर पर रखिए और मुझे अपनी शरण में ले लीजिए। मैं आपके द्वार पर आकर पड़ा हूँ।

विषय विकार मिटाओ, पाप हरो देवा, स्वामी पाप हरो देवा।
श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ, श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ, संतन की सेवा॥ ॐ जय जगदीश हरे॥

अर्थ: हे देव, मेरे अंदर के विषय-विकारों (सांसारिक मोह-माया और बुरी इच्छाओं) को मिटा दीजिए और मेरे पापों को दूर कीजिए। मेरे अंदर आपके प्रति श्रद्धा और भक्ति को बढ़ाइए, ताकि मैं संतों और अच्छे लोगों की सेवा कर सकूँ।

सिर्फ़ एक आरती नहीं, बल्कि वेदांत का सार

जब हम इस आरती के अर्थ को समझते हैं, तो यह साफ हो जाता है कि यह सिर्फ़ गाने के लिए बनाया गया एक भजन नहीं है। यह असल में वेदांत और उपनिषदों के गहरे ज्ञान का सरल रूप है।

ईश्वर का असल स्वरूप

आरती में ईश्वर को 'जगदीश', 'पूरण परमात्मा', 'पारब्रह्म परमेश्वर' और 'अगोचर' कहा गया है। ये शब्द हमें ईश्वर के उस रूप की याद दिलाते हैं जो किसी एक मूर्ति या तस्वीर तक सीमित नहीं है। वह पूरे जगत का स्वामी है, वह हर जगह है (अन्तर्यामी), वह हर सीमा से परे है (पारब्रह्म) और उसे इन आँखों से नहीं देखा जा सकता (अगोचर)। यह हिंदू धर्म की 'निर्गुण ब्रह्म' की अवधारणा है, यानी ईश्वर का वो रूप जिसका कोई आकार या गुण नहीं है।

भक्त का सच्चा भाव

दूसरी तरफ, यह आरती भक्त के भाव को भी बहुत सुंदरता से दिखाती है। भक्त खुद को 'मूरख खल कामी' और 'कुमति' कहता है। यह अहंकार का त्याग है। जब हम यह स्वीकार करते हैं कि हममें कमियाँ हैं, तभी हम ईश्वर की कृपा पाने के पात्र बनते हैं। यह विनम्रता और समर्पण का भाव ही भक्ति का मूल है। 'तुम बिन और न दूजा' कहना यह दिखाता है कि भक्त की निर्भरता सिर्फ़ और सिर्फ़ ईश्वर पर है।

इस तरह, यह आरती हमें ईश्वर के सगुण (पालनकर्ता, दुःखहर्ता) और निर्गुण (पारब्रह्म, अगोचर) दोनों रूपों से जोड़ती है और भक्त को अहंकार छोड़कर समर्पण का रास्ता दिखाती है।

निष्कर्ष: आज के जीवन में इस आरती की सीख

आज की भागदौड़ भरी ज़िंदगी में, जहाँ हम अक्सर तनाव, अहंकार और असुरक्षा से घिरे रहते हैं, 'ॐ जय जगदीश हरे' आरती एक शांत लहर की तरह है। यह हमें कुछ पल रुककर सोचने का मौका देती है।

जब हम गाते हैं 'तुम बिन और न दूजा, आस करूँ मैं जिसकी', तो हम अपने आप को याद दिलाते हैं कि दुनिया की चीज़ों पर हमारी निर्भरता हमें हमेशा दुखी करेगी, जबकि ईश्वर पर विश्वास हमें आंतरिक शक्ति देता है। जब हम कहते हैं 'मैं मूरख खल कामी', तो हम अपने अहंकार को एक तरफ रखकर अपनी गलतियों को स्वीकार करने की हिम्मत जुटाते हैं, जो किसी भी रिश्ते को बेहतर बनाने के लिए ज़रूरी है।

यह आरती सिर्फ एक धार्मिक क्रिया नहीं है, बल्कि यह रोज़ाना की जाने वाली एक 'मेंटल क्लीनिंग' या मन की सफाई की तरह है। यह हमें विनम्र बनाती है, हमारे अंदर करुणा जगाती है ('दीनबन्धु दुःखहर्ता' से प्रेरणा लेकर) और हमें यह विश्वास दिलाती है कि कितनी भी बड़ी मुश्किल क्यों न हो, एक शक्ति है जो हमेशा हमारा ध्यान रखेगी।

तो अगली बार जब आप यह आरती गाएँ, तो इसे सिर्फ़ दोहराएँ नहीं, बल्कि इसके हर शब्द को महसूस करें। यह आपको एक गहरी शांति और जुड़ाव का अनुभव कराएगी।