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पूजा के बाद तीन बार 'शांति' क्यों? जानें इसका गहरा अर्थ

पूजा के बाद तीन बार 'शांति' क्यों? जानें इसका गहरा अर्थ

आपने कभी ध्यान दिया है? जब भी कोई पूजा, हवन या कोई भी शुभ काम पूरा होता है, तो अंत में पंडित जी या घर के बड़े कहते हैं - 'ॐ शांतिः शांतिः शांतिः'। हम सब भी उनके साथ दोहराते हैं। पर क्या कभी यह सोचा है कि ये 'शांति' शब्द तीन बार ही क्यों बोला जाता है? एक बार या दो बार क्यों नहीं? क्या यह सिर्फ एक आदत है या इसके पीछे कोई गहरा मतलब है?

असल में, यह सिर्फ एक रस्म नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक बहुत गहरा और सुंदर आध्यात्मिक विचार छिपा है, जो हमारे जीवन के हर पहलू से जुड़ा हुआ है। यह तीन बार की 'शांति' एक ऐसी प्रार्थना है जो हमें हर तरह के कष्ट और अशांति से बचाने के लिए की जाती है। चलिए, आज इस रहस्य को सरल शब्दों में समझते हैं।

शांति की तलाश और तीन प्रकार के कष्ट

कुछ पाने की प्रार्थना करने से पहले, यह जानना ज़रूरी है कि हम किस चीज़ से छुटकारा पाना चाहते हैं। हमारे सनातन धर्म के महान ग्रंथों और ऋषियों ने जीवन के दुखों का बहुत गहरा अध्ययन किया। उन्होंने पाया कि इंसान को मुख्य रूप से तीन तरह के कष्ट या दुख (जिन्हें संस्कृत में 'ताप' कहा गया है) घेरते हैं। जब तक ये कष्ट जीवन में हैं, सच्ची और स्थायी शांति मिलना मुश्किल है।

इसलिए, 'शांति' का तीन बार उच्चारण, इन्हीं तीन प्रकार के तापों को शांत करने का निवेदन है। आइए इन तीनों को एक-एक करके जानें।

1. आधिदैविक ताप

ये वो कष्ट हैं जो दैवीय या प्राकृतिक शक्तियों से मिलते हैं और जिन पर हमारा कोई नियंत्रण नहीं होता। जैसे - बाढ़, भूकंप, सूखा, तूफ़ान, बिजली गिरना या बहुत ज़्यादा सर्दी या गर्मी पड़ना। इन्हें हम 'Act of God' भी कह सकते हैं। ये ऐसी परेशानियाँ हैं जो प्रकृति या अदृश्य शक्तियों की वजह से आती हैं।

2. आधिभौतिक ताप

ये वो कष्ट हैं जो हमें बाहरी दुनिया, यानी दूसरे जीव-जंतुओं और मनुष्यों से मिलते हैं। जैसे - किसी से लड़ाई-झगड़ा, चोरी, धोखा, अपमान, किसी ज़हरीले जानवर का काटना या जंगली जानवर का हमला। हमारे आस-पास के माहौल और समाज से मिलने वाले दुख इसमें गिने जाते हैं।

3. आध्यात्मिक ताप

ये वो कष्ट हैं जो हमारे अपने शरीर और मन से पैदा होते हैं। शारीरिक स्तर पर जैसे कोई बीमारी, दर्द या कोई पुरानी चोट। और मानसिक स्तर पर जैसे - चिंता, तनाव (stress), गुस्सा, लालच, घमंड, जलन और डर। अक्सर बाहर सब कुछ ठीक होते हुए भी इंसान अंदर ही अंदर इन तकलीफों से जलता रहता है। यह सबसे गहरा और सबसे व्यक्तिगत दुख है।

पहला 'शांति' - आधिदैविक शांति (दैवीय कृपा के लिए)

जब हम पहली बार 'शांति' बोलते हैं, तो हम उन सभी दैवीय और प्राकृतिक शक्तियों से प्रार्थना करते हैं जो हमारे नियंत्रण से बाहर हैं। हम ईश्वर से, प्रकृति से, ग्रहों से और सभी अदृश्य शक्तियों से निवेदन करते हैं कि वे हम पर कृपा करें।

यह इस ब्रह्मांड के प्रति एक विनम्र प्रार्थना है कि, 'हे प्रभु, हमें उन आपदाओं से बचाइए जिन्हें हम रोक नहीं सकते। बाढ़, तूफ़ान और दूसरी प्राकृतिक विपत्तियों से हमारी रक्षा कीजिए। सभी दैवीय शक्तियाँ शांत हों और संसार का कल्याण करें।' यह दिखाता है कि हम मानते हैं कि हमसे भी बड़ी कोई शक्ति है और हम उसके सामने सम्मान से झुकते हैं।

हिमालय की गोद में एक शांत मंदिर, जिसके पीछे बर्फीले पहाड़ दिख रहे हैं और सुबह की सुनहरी धूप बादलों से छनकर आ रही है, जो दैवीय शांति का प्रतीक है।

दूसरा 'शांति' - आधिभौतिक शांति (बाहरी संसार के लिए)

जब हम दूसरी बार 'शांति' का उच्चारण करते हैं, तो हम अपने आस-पास के संसार के लिए शांति मांगते हैं। हम प्रार्थना करते हैं कि हमें दूसरे मनुष्यों, जीव-जंतुओं और हमारे आस-पास के वातावरण से कोई कष्ट न मिले।

इसका अर्थ है, 'हे ईश्वर, हमारे आस-पास शांति का माहौल बना रहे। हमारा किसी से बैर-भाव न हो, कोई हमें धोखा न दे, कोई प्राणी हमें नुकसान न पहुँचाए। हमारे परिवार, पड़ोस और समाज में प्रेम और सौहार्द बना रहे।' यह एक तरह से सामाजिक और पर्यावरणीय शांति के लिए की गई प्रार्थना है, जो एक अच्छे समाज की नींव है।

तीसरा 'शांति' - आध्यात्मिक शांति (अपने भीतर के लिए)

तीसरी और अंतिम बार 'शांति' बोलना शायद सबसे महत्वपूर्ण है। यह प्रार्थना हम अपने खुद के लिए करते हैं - अपने तन और मन की शांति के लिए। बाहर कितनी भी शांति क्यों न हो, अगर हमारा मन बेचैन है तो हम कभी सुखी नहीं रह सकते।

इसका भाव है, 'हे प्रभु, मेरे शरीर को निरोगी रखिए और मेरे मन को शांत कीजिए। मुझे चिंता, क्रोध, ईर्ष्या, भय और लालच जैसे विकारों से मुक्त कीजिए। मुझे अपने भीतर सुकून और संतोष का अनुभव हो।' यह आत्म-कल्याण की प्रार्थना है, क्योंकि असली शांति की शुरुआत हमारे अपने अंदर से ही होती है। जब हम अंदर से शांत होते हैं, तभी बाहरी दुनिया की शांति का आनंद ले पाते हैं।

निष्कर्ष: सिर्फ एक शब्द नहीं, एक संपूर्ण प्रार्थना

तो अब आप समझ गए होंगे कि 'शांति, शांति, शांति' का जाप केवल एक दोहराव नहीं है। यह एक संपूर्ण और समग्र प्रार्थना है जो जीवन के हर स्तर पर कल्याण की कामना करती है:

  • पहली शांति: ब्रह्मांड और प्रकृति के लिए।
  • दूसरी शांति: समाज और आस-पास के प्राणियों के लिए।
  • तीसरी शांति: हमारे अपने तन और मन के लिए।

आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में, जहाँ तनाव और अशांति चारों ओर है, यह प्राचीन परंपरा और भी अधिक प्रासंगिक हो जाती है। यह हमें याद दिलाती है कि सच्ची शांति एकतरफा नहीं होती। हमें अपने अंदर भी शांति स्थापित करनी है, अपने रिश्तों में भी और प्रकृति के साथ भी।

अगली बार जब आप किसी पूजा या आरती के अंत में इस शांति पाठ को सुनें या बोलें, तो बस शब्द न दोहराएं। इसके गहरे अर्थ को महसूस करें। यह महसूस करें कि आप केवल अपने लिए नहीं, बल्कि पूरी सृष्टि के कल्याण के लिए प्रार्थना कर रहे हैं। यही हमारी सनातन संस्कृति की खूबसूरती है - 'सर्वे भवन्तु सुखिनः', यानी सभी सुखी हों।