होमपेज > दुर्गा > जब सब कुछ छिन जाए: राजा सुरथ और वैश्य की माँ दुर्गा को पाने की कथा

जब सब कुछ छिन जाए: राजा सुरथ और वैश्य की माँ दुर्गा को पाने की कथा

जब सब कुछ छिन जाए: राजा सुरथ और वैश्य की माँ दुर्गा को पाने की कथा

सब कुछ खोने का दर्द

क्या आपने कभी जीवन में ऐसा महसूस किया है कि आप जिस चीज़ को सबसे ज़्यादा अपना समझते थे, वही आपसे छीन ली गई हो? चाहे वह आपका पद हो, आपका घर हो, या आपके अपने लोग हों। जब सब कुछ हाथ से निकल जाता है, तब मन में एक गहरा सवाल उठता है - अब कहाँ जाएँ? किसकी शरण लें? ऐसी ही एक कहानी दुर्गा सप्तशती में आती है, जो हमें सिखाती है कि जब संसार के सारे दरवाज़े बंद हो जाएँ, तब माँ भगवती का दरवाज़ा खुलता है।

यह कथा है राजा सुरथ और समाधि नाम के एक वैश्य (व्यापारी) की। ये दोनों ही अपने-अपने जीवन में शिखर पर थे, पर भाग्य ने ऐसी करवट ली कि दोनों ही सड़क पर आ गए और सबकुछ खो बैठे।

राजा सुरथ का राज्य छिन गया

राजा सुरथ एक बहुत प्रतापी और धर्मपरायण राजा थे। वह अपनी प्रजा का अपने बच्चों की तरह ध्यान रखते थे। लेकिन उनके ही कुछ दुष्ट मंत्रियों ने शत्रुओं से मिलकर षड्यंत्र रचा और राजा पर आक्रमण कर दिया। अपनी ही सेना के कुछ लोगों के विश्वासघात के कारण राजा सुरथ युद्ध हार गए। उनकी जान तो बच गई, लेकिन राज्य, महल, परिवार, सब कुछ पीछे छूट गया। दुखी और अकेले, वह एक घोड़े पर बैठकर एक घने जंगल की ओर निकल पड़े।

वैश्य समाधि को परिवार ने निकाला

उसी जंगल में भटकते हुए राजा की नज़र एक आश्रम पर पड़ी। वह मेधा ऋषि का आश्रम था, जो बहुत शांत और पवित्र स्थान था। वहीं आश्रम के पास राजा को एक और दुखी व्यक्ति मिला। पूछने पर उसने अपना नाम समाधि बताया और कहा कि वह एक धनी व्यापारी था। उसने बताया, 'मैंने जीवन भर मेहनत करके अपने परिवार के लिए धन-दौलत इकट्ठी की। लेकिन मेरे ही लालची पत्नी और बेटों ने मेरे धन के लिए मुझे घर से निकाल दिया। आज मेरे अपने ही मेरे सबसे बड़े शत्रु बन गए हैं।'

दो दुखी हृदय, एक ही प्रश्न

एक राजा जिसने अपना राज्य खो दिया और एक व्यापारी जिसे उसके परिवार ने ठुकरा दिया, दोनों एक दूसरे में अपना दुःख देख सकते थे। वे साथ बैठकर बातें करने लगे। आश्चर्य की बात यह थी कि सबकुछ खोने के बाद भी, उनके मन में उन्हीं लोगों के लिए चिंता थी जिन्होंने उन्हें धोखा दिया था। राजा सोच रहे थे, 'मेरे पूर्वजों का खज़ाना, मेरे हाथी, मेरे सैनिक, मेरे मंत्री अब उन दुष्टों के हाथों में हैं। न जाने वे राज्य को कैसे चला रहे होंगे?'

उधर वैश्य भी यही सोच रहा था, 'मेरे बेटे और पत्नी मेरे बिना कैसे रह रहे होंगे? क्या उन्हें कोई कष्ट तो नहीं हो रहा?'

यह बहुत अजीब था। जिन लोगों ने उन्हें इतना बड़ा दुःख दिया, उन्हीं के लिए उनके मन में मोह और चिंता थी। इस उलझन को वे सुलझा नहीं पा रहे थे। अपने मन में उठते इन सवालों का जवाब पाने के लिए, वे दोनों हाथ जोड़कर मेधा ऋषि के पास गए।

राजा सुरथ और वैश्य समाधि एक घने जंगल में मेधा ऋषि के शांत आश्रम के बाहर बैठे, चिंतित मुद्रा में आपस में बात कर रहे हैं।

मेधा ऋषि का दिव्य ज्ञान

ऋषि ने उनकी पूरी बात शांति से सुनी। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, 'आप जिसे मोह या भ्रम समझ रहे हैं, वह कोई साधारण शक्ति नहीं है। यह माँ भगवती की ही शक्ति है, जिसे 'महामाया' कहते हैं। यही महामाया हैं जो सारे संसार को मोह के बंधन में बाँधकर रखती हैं। बड़े-बड़े ज्ञानी भी उनके प्रभाव से बच नहीं पाते। यह आपका दोष नहीं, यह उनकी ही लीला है।'

ऋषि ने समझाया कि जिस तरह नींद में हम सपने को सच मान लेते हैं, उसी तरह महामाया के प्रभाव से हम इस दुनिया के रिश्तों को स्थायी मानकर उनमें फँस जाते हैं। उन्होंने कहा, 'अगर आप इस बंधन से मुक्त होना चाहते हैं, तो आपको उन्हीं महामाया की शरण में जाना होगा। वही प्रसन्न होकर मनुष्य को मुक्ति का वरदान देती हैं।'

मिट्टी की मूर्ति और कठोर तपस्या

ऋषि के वचन सुनकर राजा और वैश्य की आँखें खुल गईं। उन्हें समझ आया कि उनका दुःख किसी व्यक्ति के कारण नहीं, बल्कि उनके अपने मोह के कारण है। उन्होंने निश्चय किया कि वे अब सांसारिक वस्तुओं के लिए नहीं, बल्कि माँ भगवती की कृपा पाने के लिए जीवन जिएंगे।

दोनों ने सांसारिक जीवन त्याग दिया और नदी के किनारे तपस्या करने बैठ गए। उन्होंने अपने हाथों से मिट्टी की एक देवी मूर्ति बनाई और उसी की पूजा करने लगे। उनकी तपस्या बहुत कठोर थी। वे देवी सूक्त का पाठ करते, उपवास रखते, और अपनी पूरी चेतना को माँ के चरणों में लगा देते। उन्होंने फूलों से, फलों से और यहाँ तक कि अपने शरीर से रक्त निकालकर भी देवी को अर्पण किया।

यह कोई साधारण पूजा नहीं थी; यह अपने 'अहंकार' की आहुति थी। वे देवी से यह नहीं कह रहे थे कि 'हमारा खोया हुआ लौटा दो', बल्कि वे कह रहे थे, 'हे माँ, हम अपने आप को तुम्हें सौंपते हैं।'

तीन साल तक उनकी यह कठोर तपस्या चलती रही। उनकी भक्ति और समर्पण से माँ जगदम्बा बहुत प्रसन्न हुईं।

माँ का साक्षात दर्शन और वरदान

एक दिन, उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर माँ चंडिका ने उन्हें साक्षात दर्शन दिए। माँ का रूप बहुत सुंदर और सौम्य था। उनके प्रकाश से पूरा जंगल जगमगा उठा। माँ ने मुस्कुराते हुए कहा, 'हे राजन! और हे वैश्य! मैं तुम्हारी तपस्या से बहुत प्रसन्न हूँ। माँगो, तुम क्या वरदान चाहते हो?'

राजा ने मांगा राज्य, वैश्य ने माँगा ज्ञान

माँ को अपने सामने देखकर राजा सुरथ की आँखों में आँसू आ गए। उन्होंने हाथ जोड़कर कहा, 'हे माँ! अगर आप प्रसन्न हैं तो मुझे मेरा खोया हुआ राज्य वापस दिला दीजिए, ताकि मैं फिर से धर्मपूर्वक प्रजा का पालन कर सकूँ। और अगले जन्म में मुझे ऐसा राज्य दीजिए जिसका कभी नाश न हो।'

इसके बाद माँ ने वैश्य से पूछा। वैश्य का मन अब तक संसार से पूरी तरह हट चुका था। उसने कहा, 'हे माँ! मुझे अब राज-पाठ या धन-दौलत नहीं चाहिए। मुझे तो बस वह ज्ञान दीजिए जिससे मेरे मन में 'मैं' और 'मेरे' का भाव हमेशा के लिए मिट जाए। मुझे इस मोह के बंधन से मुक्त कर दीजिए।'

देवी दोनों की इच्छा सुनकर बहुत प्रसन्न हुईं। उन्होंने राजा सुरथ को वरदान दिया कि कुछ ही समय में उन्हें उनका राज्य वापस मिल जाएगा और मृत्यु के बाद अगले जन्म में वह 'सावर्णि मनु' के नाम से प्रसिद्ध होंगे और उनका राज्य कभी नष्ट नहीं होगा।

फिर उन्होंने वैश्य को मुक्ति का परम ज्ञान प्रदान किया। माँ की कृपा से वैश्य का सारा मोह नष्ट हो गया और उन्हें आत्मज्ञान की प्राप्ति हुई।

निष्कर्ष: इस कथा से हम आज क्या सीखें?

यह कहानी सिर्फ एक पौराणिक कथा नहीं है, बल्कि आज के जीवन के लिए एक बहुत गहरा संदेश है।

  • संकट एक अवसर है: जब राजा और वैश्य ने अपना सब कुछ खो दिया, तभी उन्हें जीवन की सच्चाई जानने का अवसर मिला। अक्सर जीवन में बड़ा संकट हमें आध्यात्मिक रास्ते पर ले जाने का एक माध्यम बनता है। जब दुनियावी सहारे छूट जाते हैं, तभी हमें सच्चे सहारे की तलाश होती है।
  • समस्या बाहर नहीं, भीतर है: उनकी असली समस्या राज्य या परिवार का छिन जाना नहीं थी, बल्कि उसके प्रति 'मोह' था। मेधा ऋषि ने उन्हें यही समझाया। आज भी हम अपने दुःखों का कारण दूसरों को मानते हैं, जबकि असली जड़ हमारे भीतर का लगाव और उम्मीदें होती हैं।
  • भक्ति का सच्चा अर्थ: उनकी भक्ति केवल कुछ मांगने के लिए नहीं थी, बल्कि पूर्ण समर्पण के लिए थी। उन्होंने तीन साल तक बिना किसी फल की चिंता किए तपस्या की। सच्ची भक्ति लेन-देन नहीं, बल्कि समर्पण है।
  • सबके लिए माँ का द्वार खुला है: माँ भगवती ने राजा की सांसारिक इच्छा (भोग) भी पूरी की और वैश्य की आध्यात्मिक इच्छा (मोक्ष) भी। यह दिखाता है कि माँ अपने हर बच्चे की सुनती है, चाहे उसकी इच्छा कैसी भी हो। वह हमें वही देती हैं जो हमारे लिए सबसे अच्छा होता है।

यह कथा हमें सिखाती है कि जीवन में चाहे कितनी भी बड़ी विपत्ति क्यों न आ जाए, अगर हम सच्चे मन से माँ की शरण में जाएँ, तो वह हमें न केवल सांसारिक संकटों से उबारती हैं, बल्कि जीवन के परम लक्ष्य, यानी आत्म-शांति और मुक्ति का मार्ग भी दिखाती हैं।