कल्पना कीजिए, अनंत महासागर अपनी पूरी शक्ति से गरज रहा है। दूसरी ओर, माता सीता को रावण की कैद से छुड़ाने की चुनौती है। बीच में विशाल समुद्र ही सबसे बड़ी बाधा है। इस बाधा को पार करने के लिए भगवान श्रीराम की वानर सेना एक असंभव से दिखने वाले काम में जुटी है — समुद्र पर पुल बनाने में। बड़े-बड़े वानर विशाल चट्टानों और पेड़ों को ऐसे उठा रहे हैं, मानो वे खिलौने हों। हर तरफ 'जय श्री राम' का जयघोष गूंज रहा है।
इसी विशाल दृश्य के बीच, एक नन्हा सा जीव भी अपने काम में लगा था, जिस पर शायद ही किसी का ध्यान गया हो। यह एक छोटी सी गिलहरी थी। पर उसकी कहानी हमें सिखाती है कि भक्ति और सेवा में आकार या शक्ति का कोई महत्व नहीं होता, महत्व होता है तो सिर्फ सच्ची भावना का। चलिए, रामायण की इस दिल को छू लेने वाली कहानी को करीब से जानते हैं।
महासागर पर सेतु बनाने की विशाल योजना
लंका तक पहुंचने के लिए समुद्र को पार करना ज़रूरी था। भगवान राम ने समुद्र देव से मार्ग देने की प्रार्थना की, पर जब उन्होंने प्रार्थना नहीं सुनी, तो प्रभु ने अपना धनुष साध लिया। तब समुद्र देव प्रकट हुए और उन्होंने बताया कि उनकी सेना में नल और नील नाम के दो वानर हैं, जिन्हें श्राप के कारण यह वरदान मिला है कि उनके हाथ से छुई कोई भी चीज़ पानी में डूबेगी नहीं।
बस फिर क्या था, श्रीराम की आज्ञा से एक बहुत बड़ा काम शुरू हो गया। नल और नील की देख-रेख में पूरी वानर सेना जुट गई। कोई पहाड़ों को उठाकर लाता, कोई पेड़ों को। उन विशाल शिलाओं पर 'श्रीराम' का नाम लिखा जाता और उन्हें समुद्र में डाल दिया जाता। भगवान के नाम की शक्ति से वे पत्थर डूबने के बजाय तैरने लगते। देखते ही देखते, एक विशाल पुल आकार लेने लगा था। हर कोई अपनी पूरी ताकत और जोश के साथ इस पवित्र काम में लगा हुआ था।

एक नन्ही गिलहरी का अद्भुत प्रयास
जहाँ लाखों शक्तिशाली वानर बड़े-बड़े पत्थर उठाकर समुद्र में डाल रहे थे, वहीं एक छोटी सी गिलहरी भी इस महायज्ञ में अपनी आहुति देना चाहती थी। पर वह क्या कर सकती थी? न तो उसमें वानरों जैसी शक्ति थी, न ही वह पत्थर उठा सकती थी। लेकिन उसके दिल में भगवान राम के लिए सच्ची भक्ति और सेवा की भावना थी।
उसने एक तरीका सोचा। वह दौड़कर समुद्र के किनारे जाती, पानी में डुबकी लगाकर अपने शरीर को गीला करती, और फिर रेत पर लेटकर अपने शरीर पर जितनी हो सके उतनी रेत चिपका लेती। इसके बाद वह दौड़कर सेतु तक जाती और पत्थरों के बीच की दरारों में अपने शरीर से चिपकी रेत को झाड़ देती। वह बार-बार यही करती रही — पानी में जाना, रेत में लोटना, और पत्थरों के बीच उस रेत को भर देना।
उसका यह प्रयास शायद किसी को दिख भी नहीं रहा था। उसके नन्हे शरीर से गिरी कुछ मुट्ठी रेत का उन विशाल पत्थरों के सामने क्या मोल था? पर वह गिलहरी बिना थके, बिना किसी प्रशंसा की उम्मीद के, बस अपने प्रभु के काम में लगी हुई थी।
जब वानरों ने उड़ाया मज़ाक
कुछ बलशाली वानरों की नज़र उस गिलहरी पर पड़ी। वे अपनी ताकत के अभिमान में थे और उन्हें गिलहरी का यह प्रयास एक मज़ाक जैसा लगा। एक वानर ने उसे टोकते हुए कहा, 'ऐ नन्ही गिलहरी, तुम यह क्या कर रही हो? यहाँ से हट जाओ, कहीं हमारे पैरों के नीचे आकर कुचल न जाओ। तुम्हारे इन दो-चार कण रेत से क्या यह पुल बन जाएगा? देखो, हम कितने बड़े-बड़े पर्वत उठाकर ला रहे हैं।'
यह सुनकर दूसरे वानर भी हंसने लगे। उस गिलहरी का दिल टूट गया। उसकी आँखों में आँसू आ गए। वह किसी प्रशंसा के लिए यह नहीं कर रही थी, वह तो सिर्फ अपने राम की सेवा करना चाहती थी। दुखी मन से वह एक कोने में बैठ गई।
श्रीराम का हस्तक्षेप और प्रेम का पाठ
भगवान श्रीराम सब देख रहे थे। वे उस गिलहरी के पास गए और उसे बहुत प्रेम से अपने हाथ में उठा लिया। उनका स्पर्श पाते ही गिलहरी का सारा दुख दूर हो गया।
श्रीराम ने उसे अपनी हथेली पर बिठाकर उन वानरों से कहा, 'हे वानरों, आप अपनी शक्ति पर अभिमान कर रहे हैं, पर क्या आपने इस नन्हे जीव के प्रयास को ध्यान से देखा?'
उन्होंने समझाया, 'यह सच है कि आप बड़े-बड़े पत्थर लाकर पुल बना रहे हैं। लेकिन इन पत्थरों के बीच जो छोटी-छोटी दरारें रह जाती हैं, उन्हें कौन भर रहा है? यह गिलहरी अपने शरीर पर रेत चिपका कर लाती है और इन्हीं दरारों को भरती है। इसकी लाई हुई रेत ही इन बड़े पत्थरों को आपस में जोड़ने का काम कर रही है, जिससे यह सेतु और भी मज़बूत हो रहा है।'
श्रीराम ने आगे कहा, 'याद रखो, कोई भी काम छोटा या बड़ा नहीं होता। महत्वपूर्ण यह नहीं है कि कौन कितना काम कर रहा है, बल्कि यह है कि किसके मन में सेवा की कितनी सच्ची भावना है। इस गिलहरी का प्रयास उतना ही महत्वपूर्ण है, जितना तुम्हारा पराक्रम।'
पीठ पर तीन धारियों का वरदान
प्रभु के मुख से अपनी प्रशंसा सुनकर गिलहरी की आँखों से खुशी के आँसू बहने लगे। भगवान राम उसके निस्वार्थ सेवा भाव से इतने प्रसन्न हुए कि उन्होंने बहुत प्रेम और करुणा से अपनी उंगलियों को उसकी पीठ पर फेरा।
माना जाता है कि भगवान राम की उंगलियों के निशान ही आज भी गिलहरियों की पीठ पर तीन धारियों के रूप में मौजूद हैं। यह सिर्फ एक निशान नहीं, बल्कि इस बात का प्रतीक है कि जब कोई सच्चे मन से, बिना किसी फल की इच्छा के सेवा करता है, तो भगवान स्वयं उसे अपना स्नेह और आशीर्वाद देते हैं। यह धारियाँ उस नन्ही गिलहरी की भक्ति की अमर कहानी बन गईं।
निष्कर्ष: हर प्रयास का मूल्य है
रामायण की यह छोटी सी कहानी हमें जीवन का एक बहुत बड़ा सबक सिखाती है। आज की भागदौड़ भरी ज़िंदगी में हम अक्सर अपनी तुलना दूसरों से करते हैं। हमें लगता है कि हमारे पास दूसरों जितनी ताकत, पैसा या पद नहीं है, तो हम समाज या अपने परिवार के लिए कुछ बड़ा नहीं कर सकते। हम अपने छोटे-छोटे प्रयासों को बेकार मानकर निराश हो जाते हैं।
गिलहरी की यह कहानी हमें याद दिलाती है कि ईश्वर हमारी क्षमता नहीं, हमारी भावना देखते हैं। आप जो भी काम कर रहे हैं, चाहे वह घर का छोटा सा काम हो, ऑफिस की कोई ज़िम्मेदारी हो, या किसी की मदद करना हो — अगर आप उसे पूरी ईमानदारी और सच्चे मन से करते हैं, तो उसका मूल्य बहुत बड़ा है।
ज़रूरी नहीं कि आप पहाड़ ही उठाएं। अगर आप सिर्फ दो पत्थरों के बीच की दरार को भरने जितनी भी मदद करते हैं, तो वह भी ईश्वर की नज़र में एक महान सेवा है। अगली बार जब आप किसी गिलहरी को देखें, तो उसकी पीठ पर बनी उन तीन धारियों को देखकर भगवान राम के उस प्रेम भरे स्पर्श और सेवा के इस गहरे संदेश को ज़रूर याद कीजिएगा।



