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जब भोलेनाथ को अपने ही भक्त से भागना पड़ा: भस्मासुर की कथा

जब भोलेनाथ को अपने ही भक्त से भागना पड़ा: भस्मासुर की कथा

क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि त्रिलोक के स्वामी, देवों के देव महादेव को कभी किसी से भयभीत होकर भागना पड़ा हो? यह सुनने में ही असंभव लगता है। जिनके एक नेत्र खोलने से प्रलय आ सकता है, उन्हें कौन चुनौती दे सकता है? पर पुराणों में एक ऐसी अद्भुत कथा आती है, जो न केवल हमें हैरान करती है, बल्कि जीवन की बहुत गहरी सीख भी देती है।

यह कहानी है भगवान शिव के भोलेपन, एक भक्त की अति-महत्वाकांक्षा और भगवान विष्णु की चतुराई की। यह कथा उस समय की है, जब एक असुर ने अपनी तपस्या से ऐसी शक्ति प्राप्त कर ली, जिससे स्वयं उसके आराध्य, भगवान शिव, संकट में पड़ गए। आइए, आज हम उसी अद्भुत और शिक्षाप्रद कथा में प्रवेश करते हैं और जानते हैं कि आखिर क्यों शिव को अपने ही भक्त भस्मासुर से दूर भागना पड़ा।

कौन था भस्मासुर और क्या थी उसकी घोर तपस्या?

प्राचीन काल में वृकासुर नाम का एक अत्यंत महत्वाकांक्षी असुर था। वह अपार शक्ति और अमरता का भूखा था। उसे पता था कि तीनों लोकों में यदि कोई देवता सबसे सरलता से प्रसन्न हो सकते हैं, तो वे हैं भगवान शिव, जिन्हें भोलेनाथ भी कहा जाता है। वृकासुर ने निश्चय किया कि वह शिव की ऐसी कठोर तपस्या करेगा कि वे विवश होकर उसे मनचाहा वरदान दे दें।

उसने हिमालय की कंदराओं में जाकर कठोर तप आरंभ किया। उसने वर्षों तक अन्न-जल त्याग दिया। वह सर्दी, गर्मी, बरसात की परवाह किए बिना एक ही स्थान पर अडिग रहा। उसकी तपस्या इतनी उग्र थी कि उसके शरीर से निकलने वाले तेज से देवलोक भी कांपने लगा। उसने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए अपनी इंद्रियों पर कठोर नियंत्रण किया। जब उसे लगा कि इतने से भी भोलेनाथ प्रसन्न नहीं हो रहे, तो उसने और भी भयानक प्रण लिया। वह अपने शरीर के अंगों को काटकर हवन कुंड में आहुति के रूप में चढ़ाने लगा।

यह देखकर भी जब शिव प्रकट नहीं हुए, तो अंत में उसने अपने सिर को काटकर अर्पित करने का निर्णय लिया। जैसे ही उसने अपनी तलवार उठाई, भगवान शिव उसकी असीम भक्ति और दृढ़ता से द्रवित हो उठे और तुरंत उसके समक्ष प्रकट हो गए। उन्होंने वृकासुर का हाथ पकड़कर उसे ऐसा करने से रोका और कहा, 'मांगो, वत्स! तुम्हारी इस कठोर तपस्या से मैं अत्यंत प्रसन्न हूँ। तुम जो चाहोगे, वही मिलेगा।'

हिमालय की बर्फीली गुफा में, भस्मासुर ध्यान में लीन है। उसका शरीर कमजोर हो गया है, लेकिन चेहरा दृढ़ संकल्प से भरा है। उसके सामने भगवान शिव प्रकट हो रहे हैं, जिनका रूप शांत और सौम्य है और वे अपना हाथ उठाकर उसे वरदान दे रहे हैं।

वरदान जो अभिशाप बन गया

भगवान शिव को अपने सामने देखकर वृकासुर की आँखों में क्रूर चमक आ गई। उसने हाथ जोड़कर कहा, 'हे प्रभु! यदि आप मुझसे प्रसन्न हैं, तो मुझे यह वरदान दीजिए कि मैं जिसके भी सिर पर अपना हाथ रखूँ, वह तत्काल भस्म हो जाए।'

भगवान शिव क्षण भर के लिए भी नहीं हिचकिचाए। वे अपने भक्तों की इच्छा पूरी करने के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने बिना सोचे-समझे 'तथास्तु' कह दिया। इसी वरदान के कारण वृकासुर का नाम 'भस्मासुर' पड़ गया, यानी भस्म करने वाला असुर।

वरदान पाते ही भस्मासुर का असली स्वरूप सामने आ गया। उसकी बुद्धि अहंकार और वासना से भ्रष्ट हो गई। उसने सोचा, 'अब मैं इस ब्रह्मांड का सबसे शक्तिशाली प्राणी हूँ। मुझे कोई नहीं हरा सकता।' और फिर उसके मन में एक भयानक विचार आया। उसने सोचा कि यदि वह भगवान शिव को ही भस्म कर दे, तो वह उनकी पत्नी, देवी पार्वती को प्राप्त कर सकता है।

यह सोचते ही वह अपनी जगह से उठा और भगवान शिव की ओर बढ़ने लगा, अपना हाथ उनके सिर पर रखने के लिए। भोलेनाथ यह देखकर हैरान रह गए। उन्होंने अपने ही दिए वरदान का मान रखना था, वे उससे लड़ नहीं सकते थे। इसलिए, सृष्टि के स्वामी को अपने ही भक्त से प्राण बचाने के लिए भागना पड़ा। भगवान शिव आगे-आगे और भस्मासुर अपनी राक्षसी हँसी के साथ उनके पीछे-पीछे। यह एक विचित्र और भयावह दृश्य था।

भगवान विष्णु का दिव्य मोहिनी अवतार

देवलोक में हाहाकार मच गया। सभी देवता यह देखकर चिंतित हो गए कि स्वयं महादेव संकट में हैं। यदि शिव को कुछ हो गया, तो सृष्टि का संतुलन ही बिगड़ जाएगा। सभी देवता मदद के लिए सृष्टि के पालनहार, भगवान विष्णु के पास पहुँचे और उन्हें पूरी घटना बताई।

भगवान विष्णु ने सबको शांत किया और एक योजना बनाई। उन्होंने अपनी माया से एक अत्यंत सुंदर, अलौकिक स्त्री का रूप धारण किया। उनका यह रूप 'मोहिनी' कहलाया। मोहिनी इतनी आकर्षक थीं कि कोई भी उन्हें देखकर अपनी सुध-बुध खो सकता था।

मोहिनी उस रास्ते पर पहुँच गईं, जहाँ से भस्मासुर गुजर रहा था। जैसे ही भस्मासुर ने मोहिनी को देखा, वह शिव को भूल गया और पूरी तरह से उन पर मोहित हो गया। वह उनके पास गया और बोला, 'हे सुंदरी! मैंने आज तक तुम्हारे जैसा सौंदर्य कहीं नहीं देखा। क्या तुम मुझसे विवाह करोगी?'

मोहिनी ने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया, 'हे असुरराज! मैं आपसे विवाह करने के लिए तैयार हूँ, पर मेरी एक शर्त है। मुझे नृत्य करना बहुत पसंद है। यदि आप नृत्य में मुझे पराजित कर दें, या कम से कम मेरे हर एक नृत्य-मुद्रा की सटीक नकल कर लें, तो मैं आपकी हो जाऊँगी।'

नृत्य में छिपी थी मृत्यु की लीला

अहंकार और वासना में अंधा भस्मासुर तुरंत तैयार हो गया। उसे लगा कि एक स्त्री को नृत्य में हराना कौन सी बड़ी बात है। संगीत शुरू हुआ और मोहिनी ने नृत्य आरंभ किया। उनके हर एक mouvement, हर एक अदा में दिव्यता और आकर्षण था। भस्मासुर उनकी नकल करने की पूरी कोशिश करने लगा।

मोहिनी ने धीरे-धीरे नृत्य की गति बढ़ाई और मुद्राओं को और जटिल बनाना शुरू कर दिया। भस्मासुर भी जोश में आकर उनकी हर मुद्रा की नकल करता जा रहा था। वह नृत्य में इतना खो गया कि उसे अपने वरदान या अपने उद्देश्य का कोई ध्यान ही नहीं रहा।

नृत्य अपने चरम पर था। तभी, मोहिनी ने एक ऐसी मुद्रा बनाई, जिसमें उन्होंने अपना हाथ अपने ही सिर के ऊपर रखा। भस्मासुर, जो आँखें बंद करके बस उनकी नकल कर रहा था, उसने भी बिना सोचे-समझे अपना हाथ अपने ही सिर पर रख लिया।

और जैसे ही उसका हाथ उसके सिर से छुआ, भगवान शिव का दिया वरदान सक्रिय हो गया। एक जोरदार धमाका हुआ और भस्मासुर अपने ही वरदान की अग्नि में जलकर वहीं भस्म हो गया। इस तरह भगवान विष्णु ने अपनी चतुराई से एक बड़े संकट को टाल दिया और सृष्टि की रक्षा की।

इस कथा से हम क्या सीख सकते हैं?

भस्मासुर की यह कथा केवल एक पौराणिक कहानी नहीं है, बल्कि यह आज के जीवन के लिए भी बहुत प्रासंगिक है। इससे हमें कई महत्वपूर्ण शिक्षाएं मिलती हैं:

  • शक्ति का विवेकपूर्ण उपयोग:

    यह कथा सिखाती है कि शक्ति, चाहे वह धन की हो, पद की हो या ज्ञान की, जब बिना विवेक और अच्छे चरित्र के मिलती है, तो वह विनाशकारी हो जाती है। भस्मासुर ने कठोर तपस्या से शक्ति तो पा ली, पर उसे संभालने की विनम्रता और बुद्धि उसमें नहीं थी।

  • अपनी इच्छाओं से सावधान रहें:

    हम अक्सर ईश्वर से बहुत कुछ मांगते हैं, पर क्या हम यह सोचते हैं कि जो हम मांग रहे हैं, क्या हम उसे संभालने के काबिल हैं? यह कथा हमें सिखाती है कि हमें अपनी इच्छाओं और महत्वाकांक्षाओं के प्रति सजग रहना चाहिए, कहीं वे ही हमारे विनाश का कारण न बन जाएं।

  • बुद्धि बल से श्रेष्ठ है:

    भगवान विष्णु ने भस्मासुर का संहार किसी अस्त्र-शस्त्र से नहीं, बल्कि अपनी बुद्धि और चतुराई से किया। यह हमें बताता है कि जीवन की सबसे बड़ी लड़ाइयाँ ताकत से नहीं, बल्कि सही समय पर सही समझ से जीती जाती हैं।

  • कर्म का सिद्धांत:

    कथा यह भी दर्शाती है कि जो गड्ढा आप दूसरों के लिए खोदते हैं, उसमें एक दिन आप स्वयं भी गिर सकते हैं। भस्मासुर ने दूसरों को भस्म करने की शक्ति मांगी और अंत में स्वयं उसी से भस्म हो गया।

अंत में, यह कथा भगवान शिव के 'भोलेनाथ' स्वरूप की भी पुष्टि करती है, जो अपने भक्तों पर इतनी सरलता से विश्वास कर लेते हैं। साथ ही यह त्रिमूर्ति (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) के संतुलन को भी दिखाती है, जहाँ एक के द्वारा उत्पन्न संकट का समाधान दूसरा करता है, ताकि सृष्टि का चक्र चलता रहे।