कल्पना कीजिए कि अंतरिक्ष और आकाश में तीन विशाल सोने, चांदी और लोहे के नगर लगातार उड़ रहे हों। उन नगरों में लाखों लोग रह रहे हों और वे इतने शक्तिशाली हों कि उन्हें कोई भी अस्त्र भेद न सके।
पुराणों में वर्णित यह कोई कल्पना नहीं, बल्कि त्रिपुरासुर के तीन नगरों की सच्चाई थी। इन तीन नगरों ने देवताओं के नाक में दम कर रखा था और अंत में स्वयं महादेव को इनका संहार करना पड़ा था।
तारकासुर के तीन पुत्र और उनकी घोर तपस्या
जब भगवान कार्तिकेय ने महाबली राक्षस तारकासुर का वध कर दिया, तो उसके तीन पुत्रों—तारकाक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली—के मन में बदले की आग जलने लगी। वे जानते थे कि सीधे युद्ध में देवताओं को हराना संभव नहीं है।
इसलिए तीनों भाइयों ने मिलकर ब्रह्मा जी की अत्यंत कठोर तपस्या शुरू की। हजारों सालों तक उन्होंने केवल वायु पीकर तप किया। उनकी भक्ति और दृढ़ निश्चय देखकर ब्रह्मा जी उनके सामने प्रकट हुए और वरदान मांगने को कहा।
तीनों भाइयों ने पहले अमरता का वरदान मांगा, लेकिन ब्रह्मा जी ने कहा कि जो जन्मा है, उसका अंत निश्चित है। तब बड़ी चतुराई से उन्होंने एक ऐसा वरदान मांगा जिससे वे लगभग अमर हो जाएं।

ब्रह्मा जी से मिला अनोखा वरदान
असुरों ने ब्रह्मा जी से कहा कि वे उनके लिए ऐसे तीन अभेद्य नगर बनाएं जो आकाश में उड़ सकें। इन तीनों नगरों को नष्ट करने की केवल एक ही शर्त होनी चाहिए थी:
- तीनों नगर अलग-अलग दिशाओं में घूमेंगे और कभी एक साथ नहीं आएंगे।
- हजार साल में केवल एक बार, अभिजित नक्षत्र में, वे कुछ ही पलों के लिए एक सीध में आएंगे।
- उस समय जो भी एक ही बाण से तीनों नगरों को भेद सकेगा, केवल वही उनका वध कर पाएगा।
ब्रह्मा जी ने 'तथास्तु' कह दिया और असुरों के महान शिल्पी मयासुर को उन तीन अद्भुत नगरों के निर्माण का आदेश दिया।
तीन उड़ते हुए अभेद्य नगर: पुरियों का निर्माण
मयासुर ने अपनी अद्भुत कला से तीन विशाल नगर बनाए। सोने का नगर आकाश में सबसे ऊपर था, चांदी का नगर अंतरिक्ष में तैरता था और लोहे का विशाल नगर पृथ्वी के निकट रहता था।
इन तीनों नगरों को मिलाकर 'त्रिपुर' कहा गया और इन तीनों भाइयों को 'त्रिपुरासुर'। इन नगरों में हर तरह की सुख-सुविधाएं, विशाल महल और बाग-बगीचे थे।
शुरुआत में असुरों ने धर्म का पालन किया, वे भगवान शिव के भक्त थे और यज्ञ-हवन करते थे। इस कारण उनकी शक्ति और बढ़ गई और कोई भी शक्ति उन्हें छू तक नहीं सकती थी।
जब त्रिपुरासुर का अत्याचार बढ़ा
समय के साथ जब तीनों भाइयों को अपनी असीमित शक्ति का घमंड हो गया, तो उनका व्यवहार बदलने लगा। वे देवताओं, ऋषियों और तीनों लोकों के प्राणियों को सताने लगे।
उनके उड़ते हुए नगर अचानक किसी भी राज्य के ऊपर आ जाते और सब कुछ तबाह कर देते। देवता उनके सामने पूरी तरह बेबस थे क्योंकि वरदान के अनुसार उन्हें मारना असंभव लग रहा था।
घबराए हुए सभी देवता पहले ब्रह्मा जी और फिर भगवान विष्णु की शरण में पहुंचे। भगवान विष्णु ने देवताओं को समझाया कि जब तक असुर शिवजी के भक्त हैं और धर्म के मार्ग पर हैं, तब तक उनका वध नहीं किया जा सकता।
पुराणों के अनुसार, इसके बाद असुरों की मति भ्रमित हुई और उन्होंने धर्म का मार्ग त्याग दिया। अब उनके पाप का घड़ा पूरी तरह भर चुका था।
महादेव का रथ और ब्रह्मांड की शक्तियां
जब असुर पूरी तरह अधर्मी हो गए, तब सभी देवता भगवान शिव के पास पहुंचे और उनसे रक्षा की प्रार्थना की। महादेव ने त्रिपुरासुर का अंत करने का संकल्प लिया।
इस महायुद्ध के लिए देवताओं ने मिलकर एक ऐसा रथ तैयार किया जिसमें पूरे ब्रह्मांड की शक्तियां समाई हुई थीं। यह कोई साधारण रथ नहीं था:
- समस्त पृथ्वी उस दिव्य रथ का आधार बनी और सूर्य तथा चंद्रमा उसके दो पहिए बने।
- मेरु पर्वत को धनुष बनाया गया और शेषनाग उस धनुष की प्रत्यंचा (डोरी) बने।
- स्वयं भगवान विष्णु उस महाबाण की नोक बने और अग्नि देव उसके फलक बने।
- ब्रह्मा जी इस दिव्य रथ के सारथी बने ताकि सही समय पर रथ को नियंत्रित कर सकें।
एक ही बाण से तीन नगरों का अंत: त्रिपुरारी शिव
महादेव अपने रथ पर सवार होकर उस क्षण की प्रतीक्षा करने लगे जब तीनों नगर एक सीध में आने वाले थे। यह समय हजार साल में सिर्फ कुछ क्षणों के लिए ही आता था।
जैसे ही अभिजित नक्षत्र में तीनों उड़ते हुए नगर एक रेखा में आए, भगवान शिव ने अपने धनुष की प्रत्यंचा खींची। उस समय समस्त देवता सांस रोककर देख रहे थे।
महादेव ने 'पाशुपतास्त्र' का संधान किया और बाण छोड़ दिया। वह बाण अग्नि की भीषण ज्वाला बनकर निकला और एक ही झटके में तीनों नगरों को आर-पार छेदता हुआ निकल गया।
पलक झपकते ही तीनों नगर आग की लपटों में घिरकर भस्म हो गए और त्रिपुरासुर का अंत हो गया। उस दिन से भगवान शिव का एक नाम 'त्रिपुरारी' या 'त्रिपुरांतक' पड़ा।
निष्कर्ष: हमारे जीवन के तीन नगर और शिव की सीख
त्रिपुरासुर की यह कथा केवल एक पौराणिक युद्ध नहीं है, बल्कि हमारे भीतर के संघर्ष को भी दर्शाती है। हमारे भीतर भी तीन 'त्रिपुर' यानी तीन तरह के विकार हमेशा घूमते रहते हैं:
- काम (इच्छाएं)
- क्रोध (गुस्सा)
- लोभ (लालच)
जब तक ये तीनों हमारे मन में अलग-अलग रहते हैं, हम इनसे लड़ नहीं पाते। लेकिन जब हम ध्यान, आत्मसंयम और ईश्वर भक्ति का एक बाण चलाते हैं, तो ये तीनों विकार एक साथ शांत हो जाते हैं।
आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में यह कथा हमें सिखाती है कि अहंकार और अनुचित शक्ति चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हो, धर्म और सत्य के सामने उसका टिकना असंभव है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
भगवान शिव को त्रिपुरारी क्यों कहा जाता है?
भगवान शिव ने तारकासुर के तीनों पुत्रों (त्रिपुरासुर) के उड़ते हुए तीन नगरों का एक ही बाण से विनाश किया था। इसी कारण महादेव को त्रिपुरारी या त्रिपुरांतक कहा जाता है।
त्रिपुरासुर के तीन नगर किस धातु के बने थे?
त्रिपुरासुर के तीन नगरों का निर्माण मयासुर ने किया था। इनमें सबसे ऊपरी नगर सोने का, मध्य नगर चांदी का और सबसे निचला नगर लोहे का बना हुआ था।
त्रिपुरासुर का वध किस दिन हुआ था?
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भगवान शिव ने कार्तिक पूर्णिमा के दिन त्रिपुरासुर का वध किया था। इसी विजय की खुशी में देव दीपावली का त्योहार मनाया जाता है।


