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शिव पूजा में शंख से जल क्यों नहीं चढ़ाते? जानें कथा

शिव पूजा में शंख से जल क्यों नहीं चढ़ाते? जानें कथा

अगर आप कभी किसी शिवालय गए हों, तो आपने एक बात ज़रूर देखी होगी। शिवलिंग पर जल चढ़ाने के लिए लोग तांबे, पीतल या चांदी के लोटे का उपयोग करते हैं। लेकिन किसी भी मंदिर में आपको शंख से शिवलिंग पर जल या दूध चढ़ाते हुए कोई नहीं दिखेगा।

वहीं दूसरी तरफ, भगवान विष्णु की कोई भी पूजा शंख के बिना पूरी नहीं मानी जाती। शंख को हिंदू धर्म में बहुत पवित्र, मंगलकारी और मां लक्ष्मी का भाई माना गया है। फिर ऐसी क्या वजह है कि जिस शंख की ध्वनि से पूरा वातावरण शुद्ध हो जाता है, उसी शंख का स्पर्श महादेव की पूजा में पूरी तरह वर्जित है?

इस रहस्य की जड़ें शिव महापुराण में दर्ज एक बेहद रोचक और मार्मिक कथा से जुड़ी हैं। यह कहानी है एक पराक्रमी दैत्यराज शंखचूड़ की, जिसके अंत के साथ ही शंख की उत्पत्ति का इतिहास भी जुड़ा हुआ है।

कौन था शंखचूड़? गोलोक से जुड़ा उसका अतीत

शिव महापुराण के अनुसार, शंखचूड़ कोई साधारण असुर नहीं था। अपने पिछले जन्म में वह भगवान श्रीकृष्ण का परम मित्र और पार्षद था, जिसका नाम श्रीदामा था। वह गोलोक में वास करता था और निरंतर प्रभु की भक्ति में लीन रहता था।

एक बार गोलोक में किसी बात को लेकर श्रीदामा और देवी राधा के बीच तीव्र विवाद हो गया। क्रोध के क्षण में श्रीदामा ने देवी राधा का अनादर कर दिया। इस पर देवी राधा ने आहत होकर श्रीदामा को श्राप दे दिया कि उसे अगले जन्म में दानव कुल में जन्म लेना पड़ेगा।

गोलोक का दिव्य वातावरण जहाँ भगवान कृष्ण के पार्षद श्रीदामा हाथ जोड़कर देवी राधा से क्षमा मांग रहे हैं

श्रीदामा को अपनी भूल का अहसास हुआ और उसने हाथ जोड़कर क्षमा मांगी। तब देवी राधा का क्रोध शांत हुआ और उन्होंने कहा कि श्राप तो वापस नहीं हो सकता, लेकिन दानव बनने के बाद भी उसकी कृष्ण भक्ति बनी रहेगी और अंत में भगवान शिव के हाथों उसका उद्धार होकर वह वापस गोलोक लौटेगा।

कठिन तपस्या और शंखचूड़ का अजेय वरदान

श्राप के कारण श्रीदामा का जन्म दंभ नाम के असुर के घर हुआ। उसका नाम शंखचूड़ रखा गया। दानव कुल में जन्म लेने के बावजूद उसमें संस्कार किसी भक्त जैसे ही थे। बड़ा होकर उसने पुष्कर में जाकर ब्रह्मा जी की बहुत कठिन तपस्या की।

उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी प्रकट हुए और वरदान मांगने को कहा। शंखचूड़ ने वरदान मांगा कि वह समस्त लोकों में अजेय रहे और कोई भी देवता, दानव या यक्ष उसे पराजित न कर सके।

ब्रह्मा जी ने उसे यह वरदान देते हुए एक दिव्य 'श्रीकृष्ण कवच' दिया। साथ ही उन्होंने यह भी स्पष्ट कर दिया कि जब तक यह कवच उसके गले में रहेगा और जब तक उसकी पत्नी तुलसी का पतिव्रत धर्म सुरक्षित रहेगा, तब तक मृत्यु उसके पास भी नहीं फटक सकती।

तुलसी से विवाह और तीनों लोकों पर अधिकार

ब्रह्मा जी की आज्ञा से शंखचूड़ का विवाह धर्मध्वज की पुत्री तुलसी से हुआ। तुलसी परम साध्वी और भगवान नारायण की अनन्य भक्त थीं। उनके सत और पतिव्रत के प्रभाव से शंखचूड़ की शक्ति कई गुना बढ़ गई।

वरदान और सुरक्षा कवच के अहंकार में शंखचूड़ ने धीरे-धीरे स्वर्ग पर चढ़ाई कर दी। उसने इंद्र समेत सभी देवताओं को पराजित कर स्वर्ग से बेदखल कर दिया। तीनों लोकों में केवल शंखचूड़ की सत्ता चलने लगी और धर्म की मर्यादाएं टूटने लगीं।

बेबस और असहाय देवता अपनी फरियाद लेकर पहले ब्रह्मा जी और फिर भगवान विष्णु के पास पहुंचे। भगवान विष्णु ने कहा कि शंखचूड़ उनके परम भक्त का अवतार है और उसे केवल भगवान शिव ही मुक्ति दिला सकते हैं। इसलिए सभी देवताओं को महादेव की शरण में जाना चाहिए।

जब महादेव ने उठाया अपना त्रिशूल

देवताओं की करुण पुकार सुनकर भगवान शिव ने शंखचूड़ के पास अपने दूत को भेजा। उन्होंने संदेश भिजवाया कि वह देवताओं का राज्य लौटा दे और शांति से जीवन बिताए। लेकिन शक्ति के मद में चूर शंखचूड़ ने महादेव का प्रस्ताव ठुकरा दिया और युद्ध का मार्ग चुना।

इसके बाद महादेव की सेना और शंखचूड़ के बीच भीषण युद्ध छिड़ गया। शिवजी के गण और देवता मिलकर भी शंखचूड़ का बाल भी बांका नहीं कर पा रहे थे, क्योंकि उसके गले में श्रीकृष्ण कवच था और घर में देवी तुलसी का तप उसकी रक्षा कर रहा था।

तब जगत के कल्याण के लिए भगवान विष्णु ने एक ब्राह्मण का रूप धारण किया और दान में शंखचूड़ से उसका रक्षा कवच मांग लिया। इसके बाद विष्णु जी ने शंखचूड़ का रूप धरकर तुलसी के पास जाकर उनका सतीत्व भंग कर दिया, जिससे शंखचूड़ की अमरता का आधार टूट गया।

जैसे ही शंखचूड़ की सुरक्षा का घेरा टूटा, भगवान शिव ने अपने त्रिशूल से उस पर प्रहार किया। त्रिशूल के स्पर्श से शंखचूड़ का शरीर भस्म हो गया और उसकी आत्मा मुक्त होकर सीधे गोलोक में भगवान श्रीकृष्ण के धाम पहुंच गई।

शंख की उत्पत्ति और शिव पूजा में निषेध

कथा के अनुसार, जब शंखचूड़ भस्म हुआ, तो उसकी बची हुई अस्थियों से समुद्र में एक विशेष जीव की उत्पत्ति हुई, जिसे आज हम शंख कहते हैं। चूंकि शंखचूड़ भगवान विष्णु का अनन्य भक्त था, इसलिए भगवान नारायण ने शंख को अपना प्रिय पात्र बना लिया।

भगवान विष्णु ने वरदान दिया कि शंख की ध्वनि से नकारात्मक ऊर्जा दूर होगी और जिस घर में शंख रहेगा, वहां लक्ष्मी का वास होगा। विष्णु जी और अन्य सभी देवी-देवताओं की पूजा में शंख से जल चढ़ाना अत्यंत शुभ माना गया।

लेकिन भगवान शिव ने स्वयं शंखचूड़ का वध किया था। इसलिए मर्यादा और विधान के अनुसार, जिस दैत्य का संहार महादेव के त्रिशूल से हुआ, उसकी अस्थियों से बने शंख का उपयोग शिव जी की पूजा या अभिषेक में पूरी तरह वर्जित कर दिया गया। यही कारण है कि आज भी शिवलिंग पर शंख से जल नहीं चढ़ाया जाता।

शिव पूजा में इन चीजों का भी रखें ध्यान

शंख के अलावा कुछ और भी ऐसी पूजन सामग्रियां हैं, जिनका उपयोग शिव पूजा में नहीं किया जाता। पूजा करते समय इन बातों की जानकारी होना जरूरी है:

  • तुलसी दल: भगवान शिव पर तुलसी पत्र नहीं चढ़ाया जाता, क्योंकि तुलसी जी के पति शंखचूड़ का वध महादेव ने किया था।
  • केतकी का फूल: ब्रह्मा जी के झूठ में साथ देने के कारण भगवान शिव ने केतकी के फूल को अपनी पूजा से हमेशा के लिए निष्कासित कर दिया था।
  • हल्दी और कुमकुम: हल्दी और रोली को सौभाग्य और सौंदर्य का प्रतीक माना जाता है, जबकि शिव जी वैरागी और भस्म रमाने वाले देव हैं, इसलिए शिवलिंग पर हल्दी नहीं चढ़ाई जाती।
  • नारियल का पानी: भगवान शिव को पूरा श्रीफल (नारियल) अर्पित किया जा सकता है, लेकिन उसके जल से अभिषेक करना वर्जित माना गया है।

निष्कर्ष: इस कथा से हमें क्या सीख मिलती है?

शंखचूड़ और महादेव की यह कथा केवल एक पौराणिक घटना नहीं है, बल्कि यह हमारे रोजमर्रा के जीवन के लिए एक बहुत गहरा संदेश देती है। यह हमें सिखाती है कि शक्ति, विद्या और वरदान चाहे कितने भी बड़े हों, अगर उनके साथ अहंकार जुड़ जाए, तो पतन निश्चित होता है।

शंखचूड़ एक महान भक्त और धर्मात्मा था, लेकिन उसने अपनी शक्ति का दुरुपयोग दूसरों के अधिकार छीनने में किया। इसी अहंकार ने उसे विनाश की ओर धकेल दिया। जीवन में सफलता मिलने पर भी विनम्र बने रहना ही सबसे बड़ी सुरक्षा है।

साथ ही, यह परंपरा हमें नियमों और मर्यादाओं का सम्मान करना भी सिखाती है। जब हम किसी रीति-रिवाज के पीछे का सही कारण समझ लेते हैं, तो हमारी पूजा केवल एक औपचारिकता न रहकर एक सच्ची और गहरी श्रद्धा बन जाती है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

क्या शिव जी की आरती के समय शंख बजा सकते हैं?

हाँ, शिव जी की पूजा या आरती के दौरान शंख बजाना पूरी तरह शुभ माना जाता है। शास्त्रों में केवल शंख से शिवलिंग पर जल या दूध अर्पित करने की मनाही है, शंख की पवित्र ध्वनि करने की नहीं।

शिवलिंग पर जल चढ़ाने के लिए किस धातु का लोटा सबसे अच्छा माना जाता है?

शिवलिंग पर तांबे, पीतल, कांसे या चांदी के लोटे से जल चढ़ाना सबसे उत्तम माना गया है। दूध चढ़ाने के लिए तांबे के बर्तन का उपयोग नहीं करना चाहिए, उसके लिए पीतल या चांदी का पात्र सही रहता है।

क्या भगवान शिव के अलावा किसी अन्य देवता की पूजा में शंख वर्जित है?

शिवलिंग के अलावा सूर्य देव की पूजा में भी शंख से जल अर्पित करने का निषेध कुछ परंपराओं में माना जाता है। बाकी भगवान विष्णु, माता लक्ष्मी और अन्य देवी-देवताओं की पूजा शंख के जल से ही श्रेष्ठ मानी जाती है।